10 साल से सत्ता में BJP, क्या 2027 में भी चलेगा जादू; कांग्रेस ने कसी कमर
उत्तराखंड के गठन के बाद से ही यहां की राजनीति का एक स्थापित ट्रेंड रहा है, जिसमें हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन देखने को मिलता था। राज्य की जनता कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी को चुनकर सत्ता की कमान सौंपती थी। लेकिन साल 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद इस पारंपरिक सियासी चक्र में बड़ा बदलाव आया। बीजेपी ने न सिर्फ अपनी पकड़ मजबूत की, बल्कि लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर यह साबित कर दिया कि पुरानी परिपाटी अब बदल चुकी है। अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या आगामी 2027 के चुनाव में पार्टी जीत की हैट्रिक लगा पाएगी या फिर प्रदेश में एक बार फिर सत्ता बदलने का दौर लौटेगा।
बीजेपी की निरंतरता और जीत का दावा
साल 2017 में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करने वाली बीजेपी ने साल 2022 के चुनाव में भी शानदार प्रदर्शन किया। पार्टी ने तमाम राजनीतिक कयासों और सत्ता विरोधी रुझान की चर्चाओं को दरकिनार करते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। पिछले करीब एक दशक से सूबे की सत्ता पर काबिज बीजेपी अब इसी निरंतरता और स्थिरता को अपनी सबसे बड़ी ताकत बता रही है। पार्टी नेतृत्व का आत्मविश्वास इस बात पर टिका है कि पिछले कुछ सालों में हुए विकास कार्यों, संगठन की जमीनी मजबूती और केंद्र तथा राज्य की डबल इंजन योजनाओं के दम पर जनता एक बार फिर उन पर भरोसा जताएगी।
कांग्रेस के तरकश में स्थानीय मुद्दे
दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस लंबे राजनीतिक दबदबे को तोड़ने के लिए रणनीति तैयार करने में जुटी है। कांग्रेस का यह दावा है कि राज्य की जनता अब बदलाव चाहती है। पार्टी चुनाव में स्थानीय मुद्दों, बेरोजगारी की समस्या, तेजी से हो रहे पलायन, बढ़ती महंगाई और विकास से जुड़े अधूरे कामों को मुख्य हथियार बनाने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस का मानना है कि जनता के बीच सरकार के खिलाफ जो नाराजगी है, वह इस बार के चुनाव में सत्ता परिवर्तन का मुख्य आधार बनेगी।
पड़ोसी राज्यों से अलग उत्तराखंड का सियासी मिजाज
अक्सर उत्तराखंड की राजनीतिक तुलना उसके पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश से की जाती है, जहां हर चुनाव में सरकार बदलने का इतिहास रहा है। इसके विपरीत उत्तराखंड ने साल 2017 के बाद से उस परिपाटी को तोड़ा है। यही वजह है कि आने वाला चुनाव प्रदेश के सियासी भविष्य के लिहाज से बेहद दिलचस्प हो गया है। जहां एक तरफ सत्ताधारी दल अपनी पकड़ और विकास के नाम पर मैदान में है, वहीं विपक्ष पुरानी परंपरा को दोबारा जिंदा करने की फिराक में है। इसके अलावा कुछ क्षेत्रीय दलों और नए राजनीतिक समीकरणों की सुगबुगाहट भी चुनावी समीकरणों को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखती है।