'हम अपनी जेब से कब तक बनाएंगे सड़क', तारकोल महंगा होने से मुसीबत में उत्तराखंड के ठेकेदार

'हम अपनी जेब से कब तक बनाएंगे सड़क', तारकोल महंगा होने से मुसीबत में उत्तराखंड के ठेकेदार

देवभूमि उत्तराखंड के पर्वतीय और मैदानी इलाकों में सड़क निर्माण कार्यों की गति पर इन दिनों एक बहुत बड़ा और गंभीर संकट मंडराने लगा है। राज्यभर के ठेकेदार और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स इन दिनों भारी आर्थिक तंगी और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार होकर सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गए हैं। निर्माण कार्यों में सबसे मुख्य रूप से इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी तारकोल (Bitumen) के दाम आसमान छू रहे हैं, जिसके कारण ठेकेदारों का बजट पूरी तरह चरमरा गया है। सरकारी टेंडर और पुराने समझौतों के तहत मिलने वाली तय लागत में निर्माण कार्य पूरा करना अब ठेकेदारों के लिए असंभव सा हो गया है। प्रदेशभर के ठेकेदारों का दर्द छलक उठा है और उनका कहना है कि सरकार द्वारा समय पर रेट रिवीजन (Rate Revision) न किए जाने के कारण उन्हें अपनी जेब से लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके सड़कें बनानी पड़ रही हैं। यदि यही हाल रहा तो उत्तराखंड में सड़क निर्माण के कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट बीच में ही ठप हो सकते हैं और जनता को इसका सीधा खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

तारकोल के दाम में बेकाबू उछाल: ठेकेदारों के सामने खड़ी हुई दिवालिया होने की कगार

उत्तराखंड में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY), लोक निर्माण विभाग (PWD) और अन्य एजेंसियों के अंतर्गत हजारों किलोमीटर लंबी सड़कों के निर्माण और डामरीकरण का काम चल रहा है। पिछले कुछ महीनों में क्रूड ऑयल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और ढुलाई के खर्च में हुई भारी वृद्धि के कारण तारकोल (बिटुमेन) की कीमतों में लगातार आग लगी हुई है। स्थानीय बाजार में तारकोल के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं, जबकि सरकारी विभागों द्वारा ठेकेदारों को भुगतान के लिए जो एस्केलेशन क्लॉज़ (Escalation Clause) तय किया गया है, वह मौजूदा बाजार दरों के मुकाबले बेहद कम है। स्थिति यह हो गई है कि एक किलोमीटर सड़क पर डामरीकरण करने में जितना बजट सरकार द्वारा पास किया जा रहा है, उससे दोगुनी लागत केवल कच्चा माल खरीदने में ही खर्च हो रही है। इस आर्थिक असंतुलन के कारण छोटे और मध्यम श्रेणी के ठेकेदार दिवालिया होने के कगार पर पहुंच चुके हैं।

'हम अपनी जेब से कब तक बनाएंगे सड़क': ठेकेदार संघ का फूटा गुस्सा

उत्तराखंड कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन और विभिन्न जिलों के स्थानीय ठेकेदार संघों ने सरकार और संबंधित विभागों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए अपना आक्रोश व्यक्त किया है। ठेकेदारों का कहना है कि वे महीनों से अपनी गाढ़ी कमाई और कर्ज लेकर बैंकों से लोन चुकाते हुए सड़कों का काम तय समय पर पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि आम जनता को अच्छी और सुगम सड़कें मिल सकें। लेकिन विभाग की लालफीताशाही और पुरानी दरों पर काम करवाने की जिद ने उनकी कमर तोड़ दी है। कई ठेकेदारों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि वे अपनी जेब से पैसे लगाकर कब तक सरकारी सड़कें बनाते रहेंगे? अगर सरकार ने जल्द ही रेट रिवीजन कर बढ़ी हुई कीमतों के हिसाब से भुगतान का प्रावधान नहीं किया, तो वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने और चल रहे सभी निर्माण कार्यों को पूरी तरह रोकने के लिए बाध्य होंगे।

पहाड़ी इलाकों में भौगोलिक चुनौतियां और परिवहन लागत का दोहरा मार

पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां देश के अन्य राज्यों से बेहद भिन्न और कठिन हैं। यहाँ पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर और अल्मोड़ा जैसे दूरदराज के पहाड़ी जिलों में सड़क निर्माण सामग्री और विशेषकर तारकोल को ढोकर ले जाना अपने आप में एक बहुत बड़ा और खर्चीला काम है। मैदानी डिपो से ड्रमों या टैंकरों के जरिए तारकोल को सुदूर पहाड़ियों तक पहुंचाने में ट्रांसपोर्टेशन का खर्च कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, पहाड़ी क्षेत्रों में खराब मौसम, भूस्खलन (Landslides) और मानसून के दौरान सड़कों के बार-बार बह जाने के कारण निर्माण कार्य पहले से ही बाधित होते रहते हैं। ऐसे में तारकोल के आसमान छूते दामों ने ठेकेदारों की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है। न तो उन्हें समय पर भुगतान मिल रहा है और न ही महंगाई के अनुपात में बजट बढ़ाया जा रहा है।

सरकार और विभाग की खामोशी से ठप हो सकते हैं कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट

एक तरफ जहां उत्तराखंड सरकार चारधाम यात्रा मार्गों, सीमावर्ती क्षेत्रों की रणनीतिक सड़कों और ग्रामीण इलाकों को जोड़ने वाले संपर्क मार्गों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने का दावा कर रही है, वहीं धरातल पर वित्तीय संकट के चलते काम सुस्त पड़ते जा रहे हैं। कई स्थानों पर ठेकेदारों ने आधे-अधुरे निर्माण के बाद काम बंद कर दिया है, जिससे सड़कों पर बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं और उड़ती धूल से स्थानीय ग्रामीणों व पर्यटकों का जीना मुहाल हो गया है। राज्य के पीडब्ल्यूडी और संबंधित निर्माण विभागों के अधिकारी इस मामले में उच्च स्तर पर फाइलें आगे बढ़ाने की बात तो कह रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस राहत न मिलने के कारण ठेकेदारों में मायूसी और गुस्सा लगातार गहराता जा रहा है।

समाधान की उम्मीद में टिकी निगाहें: क्या ठेकेदारों को मिलेगी राहत?

उत्तराखंड के बुनियादी ढांचे के विकास में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले इन ठेकेदारों की मांग है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार को मिलकर तत्काल प्रभाव से 'बिटुमेन प्राइस एडजस्टमेंट फार्मूला' लागू करना चाहिए। जब तक बाजार में तारकोल के दाम स्थिर नहीं होते, तब तक ठेकेदारों को अंतर की राशि (Price Difference) का भुगतान सीधे तौर पर किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, समय पर बिलों का भुगतान न करने वाले विभागों के अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। यदि समय रहते सरकार ने इस गंभीर समस्या का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं निकाला, तो देवभूमि की सड़कें बदहाल स्थिति में ही पड़ी रहेंगी और विकास कार्यों की गति पर हमेशा के लिए ब्रेक लग जाएगा।