पितृ पक्ष शुरू होने वाला है, लेकिन इस बार 16 दिन क्यों नहीं होंगे? वजह जानकर चौंक जाएंगे

पितृ पक्ष शुरू होने वाला है, लेकिन इस बार 16 दिन क्यों नहीं होंगे? वजह जानकर चौंक जाएंगे

सनातन धर्म और वैदिक परंपरा में पितृ पक्ष (श्राद्ध महालय) का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की सर्वपितृ अमावस्या तक चलने वाला यह पावन पखवाड़ा पूरी तरह से दिवंगत पूर्वजों और पितरों की स्मृति, सेवा और आत्मिक शांति के लिए समर्पित होता है।

धार्मिक मान्यता है कि पितरों के प्रसन्न और तृप्त रहने से वंश वृद्धि, पारिवारिक सुख-शांति, आरोग्य और आर्थिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। पंचांगीय गणना के अनुसार इस वर्ष पितृ पक्ष में एक तिथि का क्षय होने के कारण श्राद्ध पक्ष पारंपरिक 16 दिनों के बजाय 15 दिनों की अवधि का होगा।

26 सितंबर से आरंभ, पूर्णिमा श्राद्ध से होगी शुरुआत

ज्योतिषाचार्य पंडित दीपक जोशी के अनुसार पितृ पक्ष की विधिवत शुरुआत आगामी 26 सितंबर से होने जा रही है। इस दिन पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान संपन्न किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि पितृ किसी भी कारणवश असंतुष्ट या रुष्ट रह जाएं, तो जातक को जीवन में कई अप्रत्याशित बाधाओं, मानसिक तनाव और पितृदोष की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसी वजह से सनातन धर्मावलंबियों के लिए श्राद्ध पक्ष की निर्धारित तिथियों पर अपने पूर्वजों के निमित्त जल तर्पण, पिंडदान, तिल-अक्षत अर्पण और ब्राह्मण भोज कराना अनिवार्य कर्तव्य बताया गया है।

एक ही दिन होगा चतुर्थी और पंचमी का श्राद्ध

पंचांग की गणनाओं के मुताबिक इस बार तिथियों के फेरबदल के चलते चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन संपन्न होगा। तिथि क्षय होने से 16 दिनों की अवधि सिमटकर 15 दिनों की रह गई है। शास्त्रों के अनुसार जिस तिथि पर पूर्वज का देहावसान हुआ हो, उसी तिथि पर उनका विधिवत श्राद्ध करने का विधान है। तिथि के घालमेल की स्थिति में पंचांग में बताए गए सूर्योदय कालीन उदया तिथि के नियमों का पालन करते हुए श्राद्ध कार्य किए जाते हैं।

10 अक्टूबर को दुर्लभ 'गजच्छाया योग', तर्पण का मिलेगा अनंत फल

इस वर्ष पितृ पक्ष का सबसे प्रमुख आकर्षण अत्यंत दुर्लभ और महाफलदायी माना जाने वाला 'गजच्छाया योग' है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर सूर्य और चंद्रमा दोनों एक साथ हस्त नक्षत्र में संचरण करेंगे। सूर्य और चंद्र का हस्त नक्षत्र में यह दिव्य संयोग 'गजच्छाया योग' का निर्माण करता है। शास्त्रों में वर्णित है कि गजच्छाया योग के दौरान किया गया श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और पवित्र तीर्थ नदियों में स्नान अक्षय फल प्रदान करता है और पितरों को कई युगों तक तृप्ति देता है। 10 अक्टूबर, शनिवार को यह अद्भुत योग सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक प्रभावी रहेगा, जिससे इस दिन पितरों की विदाई और तर्पण करना विशेष फलदायी होगा।