साल में 250 दिन की छुट्टी और ₹1.25 करोड़ की तगड़ी सैलरी
आज के इस दौर में जहां करोड़ों युवा एक अच्छी नौकरी पाने के लिए दिन-रात खून-पसीना बहाते हैं और मामूली सैलरी पर भी घंटों दफ्तरों में काम करने को मजबूर रहते हैं, वहीं अगर हम आपसे कहें कि दुनिया में एक ऐसी नौकरी भी मौजूद है जहां साल में मात्र 115 दिन काम करना पड़ता है और बाकी के 250 दिन यानी साल का ज्यादातर हिस्सा पूरी तरह से पेड छुट्टियां (Paid Holidays) मिलती हैं, तो शायद आपको अपनी कानों पर यकीन नहीं होगा। इतना ही नहीं, इस नौकरी के बदले मिलने वाला सालाना पैकेज भी कोई छोटा-मोटा नहीं बल्कि पूरे 1.25 करोड़ रुपये (Approx $150,000) है। इतनी बड़ी रकम और इतनी सारी छुट्टियों का बंपर ऑफर सुनने के बाद भी हैरानी की बात यह है कि दुनिया भर से कोई भी उम्मीदवार इस पद के लिए आगे आने को तैयार नहीं है और यह वेकेंसी लंबे समय से खाली पड़ी हुई है। आइए एक विचित्र और इंटरनेशनल लाइफस्टाइल रिपोर्टर की नजर से गहराई से जानते हैं कि इस बेहद अजीबोगरीब नौकरी की पूरी इनसाइड स्टोरी क्या है और क्यों कोई इंसान इस सुनहरे ऑफर को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
क्या है इस अनोखी नौकरी की पूरी रूपरेखा और किसे दी जाती है यह जिम्मेदारी?
यह हैरान कर देने वाला जॉब ऑफर किसी आम मल्टीनेशनल कंपनी या कॉर्पोरेट सेक्टर का नहीं है, बल्कि यह दुनिया के सबसे सुनसान, बीहड़ और खतरनाक माने जाने वाले इलाकों में से एक 'मैक्वेरी द्वीप' (Macquarie Island) या अंटार्कटिका के पास स्थित कुछ अति-दूरस्थ मौसम और अनुसंधान केंद्रों (Remote Research Stations) से जुड़ा हुआ है। इन स्थानों पर ऑस्ट्रेलिया या अन्य देशों की वैज्ञानिक एजेंसियों द्वारा मौसम की भविष्यवाणी करने, पेंगुइन, सील और दुर्लभ वन्यजीवों की आबादी की निगरानी करने तथा पर्यावरण संबंधी आंकड़ों को जुटाने के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। इस नौकरी के तहत चुने जाने वाले व्यक्ति को इन बेहद ठंडे और कटीले बर्फीले इलाकों में रहकर रिसर्च प्रोजेक्ट्स की देखरेख करनी होती है। चूंकि इन जगहों पर जलवायु परिस्थितियां इंसानी जीवन के लिए बेहद प्रतिकूल होती हैं, इसलिए सरकार या संस्थाएं कर्मचारियों को आकर्षित करने के लिए करोड़ों रुपये का भारी-भरकम वेतन पैकेज देती हैं।
साल में 250 दिन की छुट्टी का असली गणित: क्यों इन छुट्टियों का मतलब आराम नहीं बल्कि कैद है?
अक्सर लोगों को यह लगता है कि 250 दिन की छुट्टी का मतलब मौज-मस्ती, बीच घूमना या परिवार के साथ शानदार छुट्टियां बिताना होगा, लेकिन इस नौकरी के मामले में यह गणित बिल्कुल उलट है। इन बर्फीले और एकांत रिसर्च स्टेशनों पर जब आप ड्यूटी पर नहीं होते हैं, तब भी आप दुनिया के बाकी हिस्सों से पूरी तरह से कटे हुए होते हैं। आपके पास आने-जाने का कोई साधन नहीं होता क्योंकि चारों तरफ सैकड़ों मील तक केवल बर्फ का रेगिस्तान और समंदर होता है। आप चाहकर भी अपने घर वापस नहीं जा सकते, किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने नहीं जा सकते और ना ही किसी दोस्त से मिल सकते हैं। वे 250 दिन की छुट्टियां दरअसल उस खतरनाक और कड़कड़ाती ठंड वाले बंजर द्वीप पर बिताई जाने वाली 'नजरबंदी' या एकांतवास जैसी सजा बन जाती हैं, जहां इंटरनेट की स्पीड बेहद धीमी होती है या कई बार संपर्क पूरी तरह टूट जाता है।
मानसिक प्रताड़ना और भयंकर अकेलापन: क्यों बड़े-बड़े धुरंधर इस नौकरी से बना लेते हैं दूरी?
इस पद के लिए आवेदन करने वाले लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती शारीरिक ठंड से ज्यादा मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) को बनाए रखने की होती है। महीनों तक लगातार केवल बर्फ की सफेद चादर देखना, अंधेरे लंबे दिन या बिना सूरज की रातें बिताना और किसी भी इंसानी आवाज या अपने परिवार से पूरी तरह दूर रहना किसी भी सामान्य इंसान के दिमाग पर गहरा असर डाल सकता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय तक आइसोलेशन (Isolation) में रहने के कारण लोगों को गंभीर डिप्रेशन, एंग्जायटी और होमसिकनेस जैसी मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार कर्मचारियों को अपनी मानसिक स्थिति बिगड़ने के कारण समय से पहले ही हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू करके वापस लाना पड़ता है। यही मुख्य कारण है कि कोई भी समझदार व्यक्ति मोटी सैलरी के लालच में अपनी मानसिक शांति दांव पर लगाने को तैयार नहीं होता है।
क्या आप करना चाहेंगे यह सौदा? पैसों से ज्यादा जरूरी है मानसिक सुकून का संदेश
यह अनोखी नौकरी हमें इस बात का अहसास कराती है कि इस दुनिया में केवल पैसा ही सब कुछ नहीं होता है। इंसान को जीवित रहने और खुश रहने के लिए सामाजिक ताने-बाने, अपनों का साथ और एक सामान्य जीवनशैली की जरूरत होती है। भले ही कागजों पर यह नौकरी दुनिया की सबसे आसान और सबसे ज्यादा पैसे देने वाली लग रही हो, लेकिन असलियत में यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। इस वेकेंसी के खाली पड़े रहने का यह संदेश साफ है कि इंसान अपनी आजादी और मानसिक सुकून को किसी भी कीमत पर बेचने के लिए तैयार नहीं है, और यही इंसानी फितरत की सबसे बड़ी खूबी भी है।