मिसाइल ने आसमान में उड़ा दिया F-15 फाइटर जेट, तो क्या अमेरिका ने सऊदी अरब को बेच दिया कबाड़

मिसाइल ने आसमान में उड़ा दिया F-15 फाइटर जेट, तो क्या अमेरिका ने सऊदी अरब को बेच दिया कबाड़

मध्य पूर्व (Middle East) के युद्ध के मैदान से इन दिनों एक ऐसी चौंकाने वाली और सनसनीखेज खबर सामने आई है, जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और महाशक्तियों के होश उड़ा कर रख दिए हैं। यमन के हूती (Houthi) विद्रोहियों ने अपनी स्थानीय स्तर पर विकसित और तथाकथित देसी मिसाइल तकनीक का इस्तेमाल करते हुए दुनिया के सबसे ताकतवर और उन्नत माने जाने वाले अमेरिकी फाइटर जेट F-15 को आसमान में ढेर कर दिया है। इस घटना के सामने आने के बाद वैश्विक रक्षा बाजार में खलबली मच गई है और सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस फाइटर जेट को अमेरिकी वायुसेना की रीढ़ और अजेय माना जाता था, वह एक गैर-पारंपरिक और स्थानीय संगठन के हमलों के आगे कैसे धराशायी हो गया। इस हाई-प्रोफाइल हादसे के बाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस छिड़ गई है कि क्या अमेरिका ने अपने खाड़ी सहयोगी सऊदी अरब और अन्य मित्र देशों को अरबों-खरबों डॉलर लेकर केवल कबाड़ या कमतर हथियार बेच दिए हैं, या फिर आधुनिक युद्ध की तकनीक में अब पारंपरिक फाइटर जेट्स की उपयोगिता खत्म होती जा रही है। आइए इस पूरी घटना, तकनीकी पहलुओं और भू-राजनीतिक निहितार्थों को विस्तार से समझते हैं।

क्या सच में हूती विद्रोहियों ने मार गिराया F-15 फाइटर जेट और क्या है इसकी पूरी सच्चाई?

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और रक्षा विश्लेषकों से मिली जानकारी के अनुसार, यह घटना उस समय घटी जब मध्य पूर्व के आसमान में तनाव अपने चरम पर था और सामरिक गश्त की जा रही थी। हूती विद्रोहियों ने दावा किया है कि उन्होंने अपनी स्वदेशी और अपग्रेडेड एयर डिफेंस मिसाइल तकनीक का उपयोग करके इस अमेरिकी निर्मित F-15 फाइटर जेट को निशाना बनाया। हालांकि, रक्षा जगत के कुछ विशेषज्ञ यह भी मान रहे हैं कि हो सकता है हूती गुटों को इस तरह के हमलों के लिए अत्याधुनिक विदेशी तकनीक या गुप्त मदद मिली हो, लेकिन जिस प्रकार से दुनिया के सबसे महंगे और अत्याधुनिक युद्धक विमान को निशाना बनाया गया है, उसने अमेरिकी सैन्य साजो-सामान की साख को तगड़ा झटका दिया है। विमान के क्रैश होने और उसके मलबे के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद से अमेरिकी रक्षा निर्माता कंपनियों और पेंटागन के अधिकारियों पर तीखे सवाल दागे जा रहे हैं।

क्या अमेरिका ने सऊदी अरब को बेच दिया कबाड़? अरबों डॉलर के रक्षा सौदों पर उठे गंभीर सवाल

इस पूरी घटना के बाद से सऊदी अरब और अमेरिका के बीच हुए पुराने रक्षा समझौतों की गुणवत्ता पर बहुत बड़े सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। सऊदी अरब ने पिछले कई दशकों में अमेरिका से अरबों और खरबों डॉलर खर्च करके अत्याधुनिक F-15 फाइटर जेट्स, पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम और अन्य सैन्य उपकरण खरीदे हैं ताकि वे अपनी वायु सीमा को पूरी तरह से सुरक्षित रख सकें। लेकिन जब एक क्षेत्रीय विद्रोही संगठन मामूली मानी जाने वाली तकनीक या देसी मिसाइलों से इन विमानों को मार गिराने में सफल हो रहा है, तो जनता और विश्लेषक यह पूछने पर मजबूर हो गए हैं कि क्या अमेरिका अपने मित्र देशों को महंगे दामों पर ऐसा सामान बेच रहा है जो युद्ध के वास्तविक मैदान में अपनी रक्षा करने में भी विफल साबित हो रहा है। सोशल मीडिया से लेकर कूटनीतिक गलियारों तक यह चर्चा आम हो गई है कि आधुनिक युद्धनीति में अमेरिका द्वारा बेचे जाने वाले इन हथियारों की विश्वसनीयता अब खतरे में पड़ चुकी है।

आधुनिक युद्ध में पारंपरिक फाइटर जेट्स की प्रासंगिकता और ड्रोन-मिसाइल तकनीक का बढ़ता आतंक

रक्षा विशेषज्ञों का यह मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में युद्ध का तरीका पूरी तरह से बदल चुका है। अब पारंपरिक रूप से महंगे फाइटर जेट्स और बड़े युद्धपोतों का जमाना धीरे-धीरे पीछे छूट रहा है और उनकी जगह कम लागत वाले ड्रोन, स्वार्म ड्रोन तकनीक और कम दूरी की मारक मिसाइलों ने ले ली है। हूती विद्रोहियों ने जिस प्रकार से कम संसाधनों में आधुनिक अमेरिकी तकनीक को मात दी है, वह इस बात का सबूत है कि आने वाले समय में युद्ध लड़ने के तौर-तरीके पूरी तरह से बदल जाएंगे। बड़े देशों की वायुसेनाएं अब इस बात पर मंथन कर रही हैं कि यदि कुछ लाख डॉलर की मिसाइल करोड़ों डॉलर के F-15 फाइटर जेट को गिरा सकती है, तो इस तरह के महंगे विमानों को बेड़े में बनाए रखने का वित्तीय और सामरिक जोखिम कितना बड़ा हो सकता है।

वैश्विक कूटनीति पर क्या पड़ेगा असर और कैसे बदल रहे हैं मध्य पूर्व के समीकरण?

इस एक घटना ने मध्य पूर्व की भू-राजनीति (Geopolitics) के समीकरणों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है। एक तरफ जहां हूती विद्रोही इस हमले के बाद खुद को और अधिक मजबूत और आक्रामक रूप में पेश कर रहे हैं, वहीं अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों के लिए यह रक्षात्मक रूप से बहुत बड़ी चिंता का विषय बन गया है। खाड़ी के अन्य देश भी अब अमेरिकी हथियारों पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय अपने रक्षा पोर्टफोलियो में विविधता लाने और स्वदेशी तकनीक को विकसित करने पर जोर दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अमेरिकी रक्षा कंपनियां इस फजीहत के बाद अपने हथियारों की तकनीक में किस तरह के बदलाव करती हैं और वैश्विक बाजार में उनकी साख को बचाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।