16 साल से नंबर-2 पर अटका चीन! अमेरिका का ताज छीनने में छूटे पसीने, आर्थिक आंकड़ों ने खोली पोल

16 साल से नंबर-2 पर अटका चीन! अमेरिका का ताज छीनने में छूटे पसीने, आर्थिक आंकड़ों ने खोली पोल

विश्व पटल पर आर्थिक महाशक्ति बनने की होड़ में चीन पिछले 16 सालों से दूसरे नंबर के पायदान पर ही अटका हुआ है। साल 2010 में जापान को पछाड़कर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का खिताब हासिल करने वाला चीन अपनी ताकत में बेतहाशा इजाफे के बावजूद अब तक अमेरिका का ताज छीनने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। ताजा आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका की जीडीपी करीब 32.38 ट्रिलियन डॉलर के मजबूत आंकड़े पर काबिज है, जबकि दूसरे स्थान पर मौजूद चीन की अर्थव्यवस्था लगभग 20.85 ट्रिलियन डॉलर की है। तुलनात्मक रूप से देखें तो साल 2010 में चीन की जीडीपी महज 6.19 ट्रिलियन डॉलर थी, जो इन डेढ़ दशकों में तीन गुना से अधिक बढ़कर यहां तक पहुंची है, लेकिन इसी समानांतर अवधि में अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने भी अपनी रफ्तार बनाए रखते हुए अपना आकार करीब दोगुना कर लिया, जिससे दोनों मुल्कों के बीच की आर्थिक खाई अब भी काफी चौड़ी बनी हुई है।

वैश्विक फलक पर जारी इस उठापटक के बीच भारत ने पिछले दो दशकों में अपनी रैंकिंग में अभूतपूर्व सुधार करते हुए आर्थिक मोर्चे पर सबसे लंबी छलांग लगाई है। साल 2000 में 13वें पायदान पर रहने वाला भारत साल 2010 में नौवें और 2015 में सातवें स्थान पर पहुंचा, जबकि ताजा अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की छठी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनकर उभरी है। चालू वर्ष में भारत की जीडीपी विकास दर लगभग 7 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है, जो दुनिया की तमाम प्रमुख और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति मानी जा रही है। भारतीय बाजारों की यह लगातार बनी मजबूत गति देश को शीर्ष पायदानों की ओर तेजी से धकेल रही है।

वैश्विक रैंकिंग के अन्य बड़े खिलाड़ियों की बात करें तो यूरोप की दिग्गज अर्थव्यवस्था फ्रांस को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। वर्ष 2000 में दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति का तमगा रखने वाला फ्रांस फिसलकर अब सातवें पायदान पर आ चुका है। इसके विपरीत, पश्चिमी प्रतिबंधों और तमाम भू-राजनीतिक दबावों के बीच रूस ने आर्थिक मजबूती का लोहा मनवाते हुए लंबी छलांग लगाई है और साल 2000 में 21वें स्थान से सीधे 9वें पायदान पर पहुंच गया है। इन बदलते समीकरणों से साफ है कि चीन भले ही वैश्विक उत्पादन और व्यापार का बड़ा केंद्र बना हुआ हो, लेकिन अमेरिका को पछाड़कर नंबर-1 की कुर्सी हासिल करने के लिए उसे अभी कड़ा संघर्ष करना होगा, जबकि भारत जैसे तेजी से उभरते मुल्क अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई आर्थिक धुरी बनकर उभर रहे हैं।