अमेरिका में भी SIR जैसा बड़ा अभियान, ट्रंप प्रशासन के फैसले से कट सकते हैं लाखों वोट
भारत में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच अब महाशक्ति अमेरिका से भी एक बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिका भर में वोटर रिकॉर्ड की व्यापक जांच और एक नया राष्ट्रीय मतदाता डेटाबेस तैयार करने की प्रक्रिया का ऐलान कर दिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बड़े अभियान के दायरे में करीब छब्बीस लाख भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाता भी आ सकते हैं, जिनमें से लगभग दस लाख लोगों के नाम जांच के बाद प्रभावित होने या सूची से हटने की आशंका जताई जा रही है। इस फैसले के बाद से प्रवासी भारतीयों के बीच हलचल तेज हो गई है।
आईसीई (ICE) को सौंपी गई डेटाबेस की कमान, डिजिटल रिकॉर्ड का होगा मिलान
ट्रम्प प्रशासन ने इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी और जिम्मेदारी अमेरिकी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट यानी आईसीई (ICE) को सौंपी है। भारत में अपनाई जाने वाली घर-घर जाकर सत्यापन की पारंपरिक पद्धति के विपरीत, अमेरिका में यह पूरी जांच पूरी तरह से डिजिटल होगी। इसके तहत देश के सभी पचास राज्यों में मतदाता पंजीकरण के आंकड़ों को विभिन्न सरकारी और आव्रजन डेटाबेस के साथ कंप्यूटर के जरिए क्रॉस-चेक किया जाएगा।
इस पूरी कवायद के लिए भारी-भरकम बजट का प्रावधान किया गया है, और यदि किसी रिकॉर्ड में जरा सी भी गड़बड़ी या विसंगति पाई जाती है, तो संबंधित मतदाता के दस्तावेजों की फिर से बारीकी से जांच की जाएगी।
भारतवंशी बहुल राज्यों पर पड़ेगा असर और 'सेव अमेरिका एक्ट' का पेच
अमेरिका के न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में भारतीय मूल के नागरिक और मतदाता राजनीतिक रूप से काफी प्रभावशाली माने जाते हैं, ऐसे में इस सख्त जांच का सीधा असर इस समुदाय पर पड़ सकता है। हालांकि, कागजी दस्तावेजों की इस प्रक्रिया के बाद असल में कितने नाम सूची से बाहर होते हैं, यह तो पूरी जांच के बाद ही साफ हो पाएगा।
दूसरी तरफ, डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से अमेरिकी चुनावों में वोटर आईडी और नागरिकता के पुख्ता प्रमाण को अनिवार्य बनाने के पक्षधर रहे हैं। उनका प्रस्तावित 'सेव अमेरिका एक्ट' मतदाता पंजीकरण के दौरान नागरिकता का वैध दस्तावेज और वोटिंग के वक्त फोटो आईडी को जरूरी बनाता है, हालांकि अमेरिकी चुनावी व्यवस्था विकेंद्रीकृत होने के कारण राज्य-दर-राज्य अलग नियम इस राष्ट्रीय डेटाबेस के रास्ते में बड़ी कानूनी चुनौती बन सकते हैं।