दुबई बनने ही वाला था भारत का हिस्सा? मिडिल ईस्ट पर कभी चलती थी भारत की हुकूमत, जानें इतिहास के अनछुए पन्ने

दुबई बनने ही वाला था भारत का हिस्सा? मिडिल ईस्ट पर कभी चलती थी भारत की हुकूमत, जानें इतिहास के अनछुए पन्ने

भारत और खाड़ी देशों के रिश्ते आज भले ही कूटनीतिक और आर्थिक साझेदारियों पर टिके हों, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो एक दौर ऐसा भी था जब मिडिल ईस्ट के एक बड़े हिस्से पर सीधे तौर पर भारत का प्रशासनिक नियंत्रण था। क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी आया था जब दुबई को भारत का हिस्सा बनाने तक की चर्चाएं थीं? भारतीय मुद्रा का वहां खुलेआम इस्तेमाल होता था और शासन की बागडोर नई दिल्ली से तय होती थी।

कैसे जुड़ी थीं मिडिल ईस्ट और भारत की सियासी और आर्थिक तारें

ब्रिटिश राज के दौरान भारत का प्रभाव सिर्फ उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं था, बल्कि फारस की खाड़ी के कई देश सीधे तौर पर ब्रिटिश भारत के प्रशासन के अधीन आते थे। बंबई (अब मुंबई) प्रेसिडेंसी और ब्रिटिश भारत सरकार इन क्षेत्रों की नीतियां तय करती थी। गल्फ देशों के वित्तीय और राजनीतिक मामलों की कमान काफी हद तक भारतीय अधिकारियों के हाथों में थी। उस दौर में खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे पर भारतीय प्रभाव इतना गहरा था कि इसे भारत के विस्तार के रूप में देखा जाता था।

जब भारतीय रुपये से चलती थी दुबई की अर्थव्यवस्था

दुबई और अन्य अमीरात आज दुनिया के सबसे अमीर वित्तीय केंद्र माने जाते हैं, लेकिन एक वक्त ऐसा था जब वहां की स्थानीय मुद्रा के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी गल्फ रुपया (Gulf Rupee) का इस्तेमाल किया जाता था। यह मुद्रा विशेष रूप से खाड़ी देशों के लिए ही छापी जाती थी और इसका मूल्य भारतीय रुपये के बिल्कुल बराबर था। साल 1966 में जब भारत ने अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया, तब जाकर खाड़ी देशों ने अपनी स्वतंत्र मुद्रा प्रणाली अपनाने का फैसला किया और धीरे-धीरे भारतीय वित्तीय आधिपत्य वहां से समाप्त हुआ।

इतिहास के वे अनछुए पन्ने जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं

ऐतिहासिक दस्तावेजों और ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा, व्यापार और कूटनीति का पूरा नियंत्रण ब्रिटिश राज के समय भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के जरिए चलाया जाता था। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इन बंदरगाहों और व्यापारिक मार्गों पर भारतीय सैनिकों और अधिकारियों की तैनाती आम बात थी। आज भले ही खाड़ी देश पूरी तरह स्वतंत्र और स्वायत्त राष्ट्र हैं, लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज यह अनूठा सच दोनों क्षेत्रों के गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की कहानी बयां करता है।

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