फ्रांस बना 'युद्ध का मैदान'! जानें 180 शहरों में क्यों भड़ी हिंसा, 70,000 पुलिसकर्मियों के छूटे पसीने
यूरोपीय देश फ्रांस में आसमान छूती महंगाई और घटती क्रय शक्ति को लेकर आम जनता और कर्मचारी संगठनों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है। गुरुवार को देश के सैकड़ों श्रमिक और सामाजिक संगठनों के आह्वान पर करीब 2,70,000 कर्मचारियों ने देशव्यापी हड़ताल और विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। पेरिस, ल्योन, नान्तेस, रेनेस और मार्सिले जैसे प्रमुख शहरों सहित देश भर में 180 स्थानों पर आयोजित इन प्रदर्शनों ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। प्रदर्शनकारी बढ़ती महंगाई पर तत्काल नियंत्रण पाने, वेतन दरों में संशोधन करने और पेंशन राशि बढ़ाने की मांग पर अड़े हैं।
फ्रांस में पिछले एक महीने से लगातार रुक-रुक कर आंदोलन चल रहे हैं और गुरुवार का प्रदर्शन हाल के दिनों की तीसरी सबसे बड़ी रैली साबित हुआ। श्रमिक संगठनों का स्पष्ट कहना है कि ईंधन, राशन सामग्री, मकान किराया, रसोई गैस और बिजली की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जबकि आम जनता का वेतन और बुजुर्गों की पेंशन जस की तस बनी हुई है। जीवनयापन की बढ़ती लागत के चलते मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों के लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करना बेहद मुश्किल हो गया है, जिससे सामाजिक असंतोष तेजी से भड़का है।
इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल का असर देश की शिक्षा व्यवस्था और यातायात पर भी व्यापक रूप से देखा गया। आंदोलन में माध्यमिक विद्यालयों (हाई स्कूल) के हजारों छात्र भी सक्रिय रूप से शामिल हुए, जिसके कारण देश के लगभग एक-तिहाई माध्यमिक स्कूल या तो पूरी तरह बंद रहे या वहां पठन-पाठन ठप पड़ गया। राजधानी पेरिस समेत कई बड़े शहरों में मेट्रो, बस और अन्य सार्वजनिक परिवहन सेवाएं चरमरा गईं। सुरक्षा कारणों के चलते पेरिस के विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल एफिल टॉवर को आम पर्यटकों के लिए बंद करना पड़ा।
70,000 पुलिसकर्मी तैनात
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए देश भर में करीब 70,000 पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई। कई जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प और हिंसा की घटनाएं भी सामने आईं। ल्योन, नान्तेस और रेनेस में भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों को मशक्कत करनी पड़ी, जहां कुछ उपद्रवियों द्वारा सुरक्षाबलों पर धातु की वस्तुएं और पत्थर फेंके जाने की पुष्टि अधिकारियों ने की है।
यह जनाक्रोश ऐसे नाजुक मोड़ पर सामने आया है जब देश अगले साल मई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की दहलीज पर खड़ा है। फ्रांसीसी संविधान के नियमों के अनुसार राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों लगातार तीसरी बार चुनाव मैदान में नहीं उतर सकते, जिससे चुनावी मुकाबला पहले से ही अनिश्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि महंगाई और वेतन के मुद्दे पर जनभावना शांत नहीं हुई, तो आगामी चुनावों में सत्तारूढ़ दल को इसका भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।