IBSA समूह का ऐतिहासिक कदम और UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग

IBSA समूह का ऐतिहासिक कदम और UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग

वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर इन दिनों दुनिया के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठनों की बैठकें और उनके प्रस्ताव वैश्विक समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। इसी क्रम में, उभरती हुई प्रमुख वैश्विक ताकतों के संगठन IBSA (भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका) ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के मौजूदा स्वरूप और इसकी कार्यप्रणाली पर एक बहुत ही कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। IBSA मंच से स्पष्ट शब्दों में यह अल्टीमेटम जारी किया गया है कि वैश्विक शांति, सुरक्षा और आधुनिक भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को यदि वाकई न्यायसंगत बनाना है, तो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और तेजी से उभरती आर्थिक महाशक्ति यानी भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तत्काल स्थायी सदस्यता (Permanent Seat) प्रदान की जानी चाहिए। संगठन का यह मानना है कि दशकों पुरानी वैश्विक व्यवस्था अब मौजूदा दुनिया की जरूरतों को पूरा करने में पूरी तरह से असमर्थ साबित हो रही है, और जब तक ग्लोबल साउथ (Global South) के प्रमुख देशों को संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष निर्णय लेने वाले मंच पर उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तब तक इस संस्था की प्रासंगिकता पर सवाल उठते रहेंगे।

इजरायल और पाकिस्तान को वैश्विक मंच से दो टूक और कड़ी फटकार

UNSC में भारत की दावेदारी का समर्थन करने के साथ-साथ IBSA समूह ने मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में लगातार बिगड़ते सुरक्षा हालातों, संघर्षों और नियमों की अनदेखी पर भी गहरी चिंता व्यक्त की है। संगठन ने अपनी बैठक के दौरान इजरायल और पाकिस्तान दोनों को ही अंतरराष्ट्रीय संधियों, क्षेत्रीय संप्रभुता और मानवाधिकारों के मुद्दों पर आड़े हाथों लेते हुए कड़ी फटकार लगाई है। मध्य पूर्व में लगातार जारी सैन्य संघर्षों और आम नागरिकों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर इजरायल की रणनीतिक कार्रवाइयों पर सवाल उठाए गए हैं, तो वहीं दक्षिण एशिया के मोर्चे पर सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने और क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डालने के लिए पाकिस्तान के रवैये की तीखी आलोचना की गई है। IBSA के इन कड़े बयानों ने यह साबित कर दिया है कि यह त्रिपक्षीय संगठन अब वैश्विक मंचों पर मूकदर्शक बनकर रहने के बजाय दुनिया के सबसे संवेदनशील मुद्दों पर बेबाक राय रखने और शांति स्थापित करने के लिए कड़े फैसले लेने से पीछे नहीं हट रहा है।

संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की सख्त जरूरत और ग्लोबल साउथ की बढ़ती ताकत

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के पांच स्थायी सदस्यों (P5) की जो व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद बनाई गई थी, वह आज की 21वीं सदी की बहुध्रुवीय (Multipolar) दुनिया के वास्तविक परिदृश्य से कोसों दूर है। भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश पिछले कई वर्षों से लगातार यह मांग उठाते रहे हैं कि दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले महाद्वीपों और देशों को यूएनएससी के वीटो पावर वाले स्थायी मंच से बाहर रखना पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है। IBSA समूह का यह ताजा अल्टीमेटम केवल भारत के लिए समर्थन भर नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया की उन ताकतों के लिए एक सामूहिक हुंकार है जो यह चाहती हैं कि वैश्विक संस्थाओं का लोकतांत्रिकरण (Democratization) होना चाहिए। जब तक संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष अंगों में विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत नहीं किया जाता, तब तक दुनिया भर में फैल रहे संघर्षों का कोई स्थाई और न्यायसंगत समाधान निकालना असंभव होगा।

वैश्विक कूटनीति पर इस अल्टीमेटम का दूरगामी प्रभाव और भविष्य की राह

IBSA के इस कड़े रुख और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की मांग ने एक बार फिर से वैश्विक कूटनीति के गलियारों में भूचाल ला दिया है। पश्चिमी देशों और पारंपरिक महाशक्तियों पर अब यह दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है कि वे अपनी पुरानी नीतियों में बदलाव करें और बदलते वैश्विक समीकरणों को स्वीकार करें। भारत के लिए कूटनीतिक मोर्चे पर यह एक बहुत बड़ी और मजबूत बढ़त है, क्योंकि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे बड़े देशों का खुलकर साथ आना इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक समुदाय अब भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को गंभीरता से स्वीकार कर रहा है। आने वाले समय में जैसे-जैसे संयुक्त राष्ट्र के सुधारों पर बहस तेज होगी, IBSA का यह संयुक्त प्रस्ताव एक मील का पत्थर साबित होगा, जो दुनिया को एक निष्पक्ष, संतुलित और न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाएगा।