अस्पतालों पर बमबारी, डॉक्टरों को धमकी… युद्ध के बीच WMA ने क्या कहा?

अस्पतालों पर बमबारी, डॉक्टरों को धमकी… युद्ध के बीच WMA ने क्या कहा?

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे भीषण और खूनी युद्धों के बीच मानवता को शर्मसार करने वाली तस्वीरें लगातार सामने आ रही हैं। हाल ही में संघर्ष वाले क्षेत्रों में अस्पतालों, क्लीनिकों और एम्बुलेंसों को निशाना बनाकर की जा रही बमबारी ने चिकित्सा जगत को झकझोर कर रख दिया है। जान बचाने की खातिर दिन-रात मरीजों की सेवा में जुटे डॉक्टरों, नर्सों और मेडिकल स्टाफ को खुलेआम धमकियां दी जा रही हैं, जिससे युद्धग्रस्त इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से चरमरा गई हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए ग्लोबल मेडिकल कम्युनिटी में भारी आक्रोश और चिंता का माहौल बना हुआ है, क्योंकि जिनेवा कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों के तहत युद्धकाल में भी अस्पतालों और डॉक्टरों को सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है, लेकिन वर्तमान संघर्षों में इन नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन (WMA) की कड़ी चेतावनी: 'अस्पताल युद्ध का मैदान नहीं हैं'

इस अमानवीय स्थिति पर कड़ा संज्ञान लेते हुए वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन (WMA) ने दुनिया भर के नेताओं और संघर्षरत पक्षों के खिलाफ एक तीखा और चेतावनी भरा बयान जारी किया है। डब्ल्यूएमए (WMA) ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अस्पताल और चिकित्सा संस्थान कभी भी युद्ध का मैदान नहीं हो सकते और डॉक्टरों को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय युद्ध अपराध के दायरे में आता है। संगठन के शीर्ष अधिकारियों ने कहा है कि जब घायलों और बीमारों का इलाज कर रहे चिकित्सकों को ही मौत के घाट उतारा जाएगा या उन्हें धमकियां दी जाएंगी, तो मानवता का आखिरी सहारा भी खत्म हो जाएगा। डब्ल्यूएमए ने तत्काल प्रभाव से सभी प्रकार के सैन्य हमलों को रोकने और स्वास्थ्य कर्मियों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने की पुरजोर मांग की है, ताकि युद्ध के बीच भी इंसानी जिंदगियों को बचाया जा सके।

डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की दुर्दशा: जान जोखिम में डालकर मरीजों का इलाज करने को मजबूर स्वास्थ्य कर्मी

युद्ध के मैदानों के भीतर काम कर रहे डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की कहानियां दिल दहला देने वाली हैं। बमबारी के साए में और बिना बिजली, पानी व जरूरी दवाइयों के ये जांबाज चिकित्सक अपनी खुद की जान को जोखिम में डालकर दिन-रात ऑपरेशन थियेटर में मरीजों की जान बचा रहे हैं। कई अस्पतालों पर हवाई हमले होने के कारण डॉक्टरों को मलबे के ढेर के बीच ही अस्थायी कैंप लगाकर मरीजों का इलाज करना पड़ रहा है। इसके बावजूद, स्थानीय सशस्त्र बलों या युद्धरत पक्षों द्वारा उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वे घायल लड़ाकों की जानकारी दें या चुनिंदा लोगों का ही इलाज करें। इस तरह के दबाव और धमकियों के बीच काम करना चिकित्सा पेशा की नैतिकता और मानवीय गरिमा के बिल्कुल खिलाफ है, जिसकी वैश्विक स्तर पर तीव्र निंदा की जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी पर उठ रहे सवाल और मानवता की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत

अस्पतालों पर हो रहे इन हमलों और डॉक्टरों को मिलने वाली धमकियों के मामलों में संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की भूमिका पर भी अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अब भी सख्त कदम नहीं उठाए, तो युद्ध के नियमों का पालन कराने वाली व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी। जिनेवा कन्वेंशन के नियमों को सख्ती से लागू करने, दोषी पक्षों को जवाबदेह ठहराने और संघर्ष क्षेत्रों में मानवीय गलियारे (Humanitarian Corridors) बनाकर चिकित्सा सामग्री और डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है। जब तक दुनिया के ताकतवर देश इस दिशा में एकजुट होकर ठोस पहल नहीं करेंगे, तब तक युद्ध की आग में झुलस रहे मासूम नागरिकों और उनकी जान बचाने वाले डॉक्टरों का यह दर्द यूं ही बना रहेगा।