हूती विद्रोहियों ने दबाई तेल सप्लाई की नस, अब दुनिया पर मंडरा रहा डीजल संकट

हूती विद्रोहियों ने दबाई तेल सप्लाई की नस, अब दुनिया पर मंडरा रहा डीजल संकट

यमन के सशस्त्र हूती मिलिशिया समूह ने समुद्री व्यापार की सबसे संवेदनशील नस दबाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। विद्रोहियों ने मोका बंदरगाह के साथ-साथ लाल सागर के मुख्य मुहाने 'बाब-अल-मंदेब' जलडमरूमध्य को नियंत्रित करने वाले रणनीतिक द्वीपों पर कब्जा जमा लिया है।

अरबी में 'आंसुओं का द्वार' कहे जाने वाले इस समुद्री रास्ते पर कब्जे का असर वाशिंगटन, नई दिल्ली, रियाद और इस्लामाबाद तक महसूस किया जा रहा है। साल 2023 से पहले जहां इस मार्ग से रोजाना लगभग 9.3 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद निकलते थे, वहीं निरंतर हमलों के चलते यह आंकड़ा 2025 तक घटकर 4.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर सिमट गया था, जो अब पूरी तरह संकट में घिर चुका है।

सऊदी तेल सप्लाई पर ब्रेक और ब्रेंट क्रूड $105 के पार

अप्रैल 2026 में ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य बंद किए जाने के बाद सऊदी अरब अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लाल सागर से तेल की निकासी कर रहा था। हमलों में ठहराव के दौरान अप्रैल-जून तिमाही में सऊदी अरब का निर्यात 8.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया था, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें काबू में थीं। लेकिन अब हूतियों द्वारा सऊदी शहरों, रिफाइनरियों और पाइपलाइनों को सीधे ड्रोन और मिसाइलों से निशाना बनाए जाने के बाद सऊदी अरब ने उत्पादन में कटौती कर दी है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर से उछलकर 105 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है, और आपूर्ति बाधित रहने पर इसमें और बड़े उछाल की आशंका जताई जा रही है।

शिपिंग पर भारी बीमा खर्च और सुरक्षा का संकट

हालांकि हूतियों का दावा है कि उनके निशाने पर केवल सऊदी अरब के पोत हैं और अन्य देशों के जहाज सुरक्षित हैं, लेकिन शिपिंग कंपनियां इस पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। जहाजों के लिए युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी हो चुकी है। आधुनिक दौर में व्यापारिक रास्तों को ठप करने के लिए विशाल नौसेना की जरूरत नहीं रह गई है; सस्ते ड्रोन, मिसाइलें और आसमान छूता बीमा खर्च ही पूरे समुद्री कारोबार का दम घोंटने के लिए काफी साबित हो रहे हैं। सऊदी अरब स्वेज नहर से छोटे जहाजों के जरिए सीमित तेल भेजने की कोशिश कर रहा है, लेकिन कुल निर्यात की मात्रा में भारी गिरावट तय मानी जा रही है।

ट्रंप का मदद से इनकार और खोखली सुरक्षा गारंटी

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गहरा असर कूटनीतिक मोर्चे पर पड़ा है। पिछले साल नवंबर में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच नाटो की तर्ज पर हुए सुरक्षा समझौते की हवा निकल गई है। हूती हमलों के बाद क्राउन प्रिंस द्वारा अमेरिकी सेना भेजने की दो बार की गई व्यक्तिगत अपीलों को ट्रंप ने ठुकरा दिया और केवल खुफिया जानकारी देने तक सीमित रहे। अमेरिका में होने वाले आगामी नवंबर चुनावों में संसद (कांग्रेस) के दोनों सदनों में हार के डर से ट्रंप युद्ध में उतरकर घरेलू मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहते। दूसरी ओर, सऊदी अरब का पाकिस्तान और तुर्की के साथ हुआ बहुचर्चित 'मक्का सुरक्षा समझौता' भी महज कागजी शेर साबित होता दिख रहा है, जिससे नई दिल्ली के कूटनीतिक गलियारों को बड़ी राहत मिली है।

कच्चा तेल नहीं, दुनिया के सामने डीजल का महासंकट

वैश्विक ऊर्जा बाजार के जानकारों के अनुसार असली खतरा कच्चे तेल की कमी नहीं, बल्कि रिफाइंड उत्पादों विशेषकर डीजल का है। सऊदी अरब का 40 लाख बैरल कच्चा तेल और 40 लाख बैरल रिफाइंड उत्पाद लाल सागर में अटक गया है। इसके साथ ही यूक्रेनी हमलों में रूसी रिफाइनरियों के तबाह होने से रूस का रिफाइंड उत्पादन 20 लाख बैरल घट चुका है और मॉस्को ने डीजल निर्यात पर रोक लगा रखी है। अमेरिका में डीजल की कीमतें 6 डॉलर से बढ़कर 8 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंचने का अनुमान है, जो साल की शुरुआत से दोगुना है। डीजल की यह तेज महंगाई परिवहन लागत बढ़ाकर वैश्विक स्तर पर नई आर्थिक मंदी ला सकती है।

भारत के सामने महंगाई और सब्सिडी का दोहरा पेच

भारत के लिए यह संकट दोधारी तलवार साबित हो रहा है। भारत दुनिया का बड़ा तेल आयातक होने के साथ रिफाइंड पेट्रोलियम का प्रमुख निर्यातक भी है। रिफाइंड उत्पादों के ऊंचे मार्जिन से रिलायंस और नायरा जैसी घरेलू रिफाइनरियों का मुनाफा बढ़ रहा है। लेकिन घरेलू मोर्चे पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखना केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा। यदि होर्मुज और बाब-अल-मंदेब दोनों लंबे समय तक बंद रहते हैं, तो सरकार को अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर फिर से निर्यात शुल्क लगाना पड़ सकता है। हालांकि, कच्चे तेल के 100 डॉलर से ऊपर बने रहने पर सरकारी खजाने पर सब्सिडी का बोझ बेतहाशा बढ़ेगा, जिससे मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे को संतुलित करना बेहद पेचीदा हो जाएगा।