इजरायल चुनाव 2026: 120 सीटों पर महामुकाबला, नेतन्याहू के भविष्य पर जनता बंटी और त्रिशंकु संसद के आसार

इजरायल चुनाव 2026: 120 सीटों पर महामुकाबला, नेतन्याहू के भविष्य पर जनता बंटी और त्रिशंकु संसद के आसार

इजरायल में राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है और देश की संसद यानी नेसेट (Knesset) की 120 सीटों के लिए कल होने वाले मतदान को लेकर तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। यह चुनाव इजरायल के इतिहास के सबसे अहम चुनावों में माना जा रहा है, क्योंकि 7 अक्टूबर के बाद देश की सुरक्षा, राजनीतिक दिशा और आंतरिक संतुलन पूरी तरह से दांव पर लगे हुए हैं। तेल अवीव से लेकर यरुशलम तक की सड़कों पर राजनीतिक दलों के पोस्टर और रैलियों का दौर थम चुका है, और अब मतदाता यह तय करने के लिए तैयार हैं कि देश की बागडोर किसके हाथ में जाएगी।

इज़रायल चुनाव 2026: क्या है नेसेट के 120 सीटों का पूरा गणित और बहुमत का जादुई आंकड़ा?

इजरायल की संसद 'नेसेट' में कुल 120 सीटें होती हैं और सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सीटों के जादुई आंकड़े को पार करना होता है। आखिरी ओपिनियन पोल और चुनावी सर्वे के मुताबिक, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गुट और उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। कई प्रमुख पोल यह इशारा कर रहे हैं कि चुनाव के बाद एक बार फिर त्रिशंकु संसद (Hung Parliament) की स्थिति बन सकती है, क्योंकि दोनों ही मुख्य खेमों में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ नहीं दिख रहा है। नेतन्याहू की पार्टी लिकुड और पूर्व सैन्य प्रमुख गदी ईसेनकोट की पार्टी 'यशार' के बीच मुख्य मुकाबला बना हुआ है, जबकि धुर-दक्षिणपंथी और वामपंथी दल भी अपनी मजबूत जमीन तलाश रहे हैं।

चुनाव से पहले क्या कह रही है ज़मीनी स्तर की जनता? विभाजित नजर आ रहा है इज़रायली समाज

इस चुनाव को लेकर इजरायल की जनता पूरी तरह से बंटी हुई नजर आ रही है। यरुशलम और तेल अवीव के बाजारों और चौराहों पर आम नागरिकों से बात करने पर अलग-अलग और तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां बेंजामिन नेतन्याहू के समर्थक उन्हें देश की सुरक्षा और क्षेत्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए सबसे मजबूत और अनुभवी नेता मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बदलाव चाहने वाले मतदाता एक नई राजनीतिक सुबह की उम्मीद कर रहे हैं। यरुशलम के एक स्थानीय निवासी रफेल ओहायोन का कहना है कि संकट के इस दौर में केवल नेतन्याहू ही देश को सुरक्षित रख सकते हैं और उनके बिना इजरायल अस्तित्व के संकट में पड़ सकता है। इसके विपरीत, एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो देश की छवि सुधारने, महंगाई से राहत पाने और एक नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे लाने की वकालत कर रहा है।

अरब मतदाताओं की बढ़ती सक्रियता और नए दलों की भूमिका से बदल सकता है पूरा राजनीतिक समीकरण

इस बार के चुनाव में अरब मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी (Astronomical Arab Turnout) और कई छोटे दलों के चुनावी मैदान में होने से समीकरण बेहद दिलचस्प हो गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अरब दलों का मतदान प्रतिशत उम्मीद के मुताबिक ऊंचा रहता है, तो यह इजरायल की राजनीति की पारंपरिक दिशा को पूरी तरह बदल सकता है। इसके अलावा, कई छोटे गठबंधन और नए दल यदि इलेक्टोरल थ्रेशोल्ड (Electoral Threshold) को पार करने में सफल होते हैं, तो वे सरकार बनाने या गिराने में 'किंगमेकर' की भूमिका निभा सकते हैं। यही वजह है कि अंतिम समय तक सभी दल हर एक वोट को अपने पाले में लाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।

नेतान्याहू का राजनीतिक भविष्य और आगे के संभावित गठबंधन विकल्प

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक करियर के लिए यह चुनाव एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हो रहा है। यदि चुनाव परिणाम खंडित आते हैं और किसी भी गुट को 61 सीटें नहीं मिलती हैं, तो इजरायल में एक बार फिर नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (National Unity Government) यानी राष्ट्रीय एकता सरकार बनने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। अतीत में भी राजनीतिक गतिरोध को खत्म करने के लिए ऐसे प्रयोग किए जा चुके हैं। हालांकि, विरोधी दलों का कड़ा रुख और नेतन्याहू के खिलाफ चल रही राजनीतिक बयानबाजी इस राह को आसान नहीं बनाती। अब सबकी निगाहें कल पड़ने वाले वोटों और आने वाले चुनाव परिणामों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि मध्य पूर्व के इस देश की कमान अगले कुछ सालों तक किसके हाथों में सुरक्षित रहेगी।