G-20 में अमेरिका-चीन जैसे सुपरपावर पर बरसे जयशंकर, रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए भारत ने पेश किया रोडमैप

G-20 में अमेरिका-चीन जैसे सुपरपावर पर बरसे जयशंकर, रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए भारत ने पेश किया रोडमैप

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मंच G-20 की बैठकों के दौरान भारत ने एक बार फिर अपनी स्वतंत्र, मुखर और बेबाक विदेश नीति का लोहा पूरी दुनिया को मनवा दिया है। दुनिया के तमाम ताकतवर देशों और महाशक्तियों की मौजूदगी में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दो टूक अंदाज में अमेरिका, चीन और अन्य पश्चिमी सुपरपावर देशों को आईना दिखाते हुए वैश्विक व्यवस्था की कमियों पर तीखा प्रहार किया। एस जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया भर के संघर्षों और आर्थिक अनिश्चितताओं का ठीकरा सिर्फ विकासशील देशों पर नहीं फोड़ा जा सकता, बल्कि आज वैश्विक शांति के लिए बड़े देशों को अपनी संकीर्ण भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठना होगा। इस दौरान भारत ने केवल आलोचना करने के बजाय रूस-यूक्रेन युद्ध को तत्काल प्रभाव से रोकने और कूटनीतिक संवाद की बहाली के लिए एक बेहद व्यावहारिक, स्पष्ट और व्यापक रोडमैप भी दुनिया के सामने पेश किया, जिसकी गूंज अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया से लेकर वाशिंगटन और मास्को तक सुनाई दे रही है।

वैश्विक राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में जब अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियां अपने-अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए आमने-सामने हैं और दुनिया दो स्पष्ट ध्रुवों में बंटती हुई नजर आ रही है, तब भारत ने 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के सच्चे और मुखर प्रवक्ता के रूप में अपनी भूमिका को बेहद मजबूती से निभाया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर का यह कड़क और संतुलित अंदाज इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आज का नया भारत किसी भी महाशक्ति के दबाव में आए बिना अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और वैश्विक मानवता के हितों को सर्वोपरि रखता है। आइए जानते हैं कि G-20 के इस हाई-प्रोफाइल मंच से एस जयशंकर ने सुपरपावर देशों को क्या कड़े संदेश दिए और भारत द्वारा पेश किए गए उस शांति रोडमैप में आखिर कौन सी मुख्य बातें शामिल हैं जो युद्ध के काले बादलों को छंटाने की ताकत रखती हैं।

सुपरपावर देशों की दोहरी नीतियों पर एस जयशंकर का तीखा प्रहार, वैश्विक मंच पर उड़े होश

G-20 के सत्र को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बिना किसी लाग-लपेट के दुनिया के बड़े और तथाकथित सुपरपावर देशों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जब दुनिया के किसी एक हिस्से में संकट पैदा होता है, तो महाशक्तियां अपनी सुविधानुसार नियम तय करती हैं और बाकी दुनिया से यह उम्मीद करती हैं कि वे चुपचाप उनके फैसलों को स्वीकार कर लें। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain), खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संकट का हवाला देते हुए जयशंकर ने कहा कि पश्चिम देशों की नीतियों और प्रतिबंधों के कारण विकासशील तथा गरीब देशों को सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, जबकि इन संकटों को पैदा करने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।

विशेष रूप से अमेरिका और चीन का बिना नाम लिए उन्होंने यह संदेश दिया कि दुनिया अब शीत युद्ध के दौर की तरह किसी की पिछलग्गू बनकर नहीं रहने वाली है। भारत ने हमेशा 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) के सिद्धांत का पालन किया है और रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी पश्चिमी देशों के तमाम भारी दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों को ताक पर नहीं रखा। जयशंकर ने दो टूक कहा कि आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और क्षेत्रीय युद्ध जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान केवल एकतरफा प्रतिबंधों या भाषणबाजी से नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए वास्तविक सहयोग और आपसी संवाद की अनिवार्यता को समझना होगा।

रूस-यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए भारत का मास्टरस्ट्रोक: पेश किया गया व्यावहारिक शांति रोडमैप

इस भाषण का सबसे महत्वपूर्ण और कूटनीतिज्ञ रूप से क्रांतिकारी हिस्सा वह रहा जब भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए एक ठोस और व्यावहारिक रोडमैप दुनिया के सामने रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस संदेश को दोहराते हुए कि "यह युद्ध का युग नहीं है", एस जयशंकर ने स्पष्ट किया कि युद्ध के मैदान में किसी भी समस्या का सैन्य समाधान संभव नहीं है, चाहे वह कितना भी लंबा खिंच जाए। अंततः सभी पक्षों को बातचीत की टेबल पर आना ही होगा।

भारत द्वारा पेश किए गए इस शांति रोडमैप के मुख्य बिंदुओं में निम्नलिखित बातें शामिल हैं:

  1. तत्काल युद्धविराम और मानवीय गलियारे: संघर्ष वाले क्षेत्रों में तुरंत सैन्य कार्रवाइयों को रोककर फंसे हुए नागरिकों और बच्चों को सुरक्षित निकालने के लिए मानवीय गलियारे (Humanitarian Corridors) स्थापित किए जाएं।

  2. शर्तहीन कूटनीतिक संवाद: रूस, यूक्रेन और यूरोपीय देशों के बीच बिना किसी पूर्व शर्त के उच्चस्तरीय सीधी बातचीत शुरू की जाए, जिसमें क्षेत्रीय संप्रभुता और सुरक्षा चिंताओं दोनों का सम्मान हो।

  3. खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा की बहाली: वैश्विक अर्थव्यवस्था को तबाह कर रहे उर्वरक, गेंहू और कच्चे तेल के व्यापार पर लगे एकतरफा प्रतिबंधों की समीक्षा की जाए ताकि ग्लोबल साउथ के देशों को भुखमरी और महंगाई से राहत मिल सके।

  4. संयुक्त राष्ट्र सुधार: वैश्विक शांति संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में तत्काल व्यापक सुधार किए जाएं ताकि मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।

पश्चिमी देशों और रूस दोनों के लिए क्यों स्वीकार्य बन रहा है भारत का दृष्टिकोण?

भारत की इस कूटनीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह रूस और अमेरिका-यूक्रेन दोनों पक्षों के साथ समान रूप से विश्वसनीय संबंध बनाए रखने में सफल रहा है। जहां एक ओर पश्चिमी देश भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में चीन के खिलाफ एक रणनीतिक संतुलनकर्ता के रूप में देखते हैं, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ भारत के दशकों पुराने ऐतिहासिक, ऊर्जा और रक्षा संबंध आज भी उतने ही प्रगाढ़ हैं। यही कारण है कि जब भारत युद्ध रोकने के लिए कोई रोडमैप पेश करता है, तो उसे दुनिया का कोई भी देश सिरे से खारिज नहीं कर सकता।

रूस-यूक्रेन संघर्ष के शुरू होने के बाद से ही भारत ने कभी भी रूस की खुली आलोचना करने के पश्चिमी दबाव के आगे घुटने नहीं टेके, बल्कि हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह बात दोहराई कि भारत शांति के पक्ष में है और इस युद्ध को समाप्त करने के लिए जो भी संभव होगा, वह हरसंभव कूटनीतिक मदद करने को तैयार है। दुनिया के कई छोटे और मध्यम वर्गीय देश अब भारत के इस रुख की सराहना कर रहे हैं और उन्हें लगने लगा है कि केवल भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो महाशक्तियों के बीच निष्पक्ष मध्यस्थ (Mediator) की भूमिका निभा सकता है।

निष्कर्ष: वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती धमक और भविष्य की नई दिशा

G-20 के मंच से एस जयशंकर द्वारा अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों को दी गई खरी-खरी और पेश किया गया यह शांति रोडमैप इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि अब भारत केवल दुनिया के फैसलों का दर्शक नहीं है, बल्कि वह वैश्विक एजेंडे को तय करने वाला एक प्रमुख नायक बन चुका है। भारत की यह स्वतंत्र विदेश नीति और शांति का संदेश इस बात की गारंटी देता है कि आने वाले समय में भारत दुनिया के सबसे जटिल और गंभीर संकटों को सुलझाने में एक केंद्रीय भूमिका निभाएगा। महाशक्तियों की आपाधापी के बीच भारत का यह कदम न केवल देश के बढ़ते राजनीतिक कद को दर्शाता है, बल्कि पूरी मानवता को युद्ध के अंधकार से निकालकर शांति के उजाले की ओर ले जाने की एक ईमानदार और मजबूत कोशिश भी है।