न जलाएंगे, न दफनाएंगे... मौत के बाद इंसानी शरीर से बनेगी खाद, भारत के दोस्त का अजीब फैसला
दुनिया भर में अंतिम संस्कार को लेकर सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं चली आ रही हैं, जिनमें मुख्य रूप से शव को जलाया या दफनाया जाता है। हालांकि, बढ़ते शहरीकरण, जमीनों की कमी और पर्यावरण के प्रति बढ़ती चिंताओं के बीच भारत के मित्र देश अमेरिका ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। अमेरिका के वॉशिंगटन और न्यूयॉर्क सहित कई प्रमुख राज्यों ने अंतिम संस्कार के एक बेहद अनोखे और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प 'ह्यूमन कंपोस्टिंग' (Human Composting) यानी मानव खाद प्रक्रिया को कानूनी मान्यता दे दी है। इस फैसले के तहत अब इंसान की मृत्यु के बाद उसके शरीर को न तो आग के हवाले किया जाएगा और न ही जमीन में दफनाया जाएगा, बल्कि वैज्ञानिक विधि से उसके अवशेषों को पौष्टिक मिट्टी और जैविक खाद में बदल दिया जाएगा।
कैसे काम करती है ह्यूमन कंपोस्टिंग? जानिए प्राकृतिक शव सड़न प्रक्रिया का पूरा विज्ञान
वैज्ञानिक भाषा में ह्यूमन कंपोस्टिंग को 'नेचुरल ऑर्गेनिक रिडक्शन' (Natural Organic Reduction) कहा जाता है। इस प्रक्रिया में मृत शरीर को एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए बेलनाकार स्टील के पुनरुत्पादक कंटेनर (Vessel) में रखा जाता है। शव के साथ लकड़ी के बुरादे (Woodchips), अल्फाल्फा घास और पुआल को भरा जाता है, जिससे प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों (Microbes) के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। अगले 30 से 45 दिनों तक कंटेनर के भीतर तापमान, ऑक्सीजन और कार्बन डाईऑक्साइड के स्तर को सटीक रूप से नियंत्रित किया जाता है। इस दौरान सूक्ष्मजीव प्राकृतिक तरीके से शरीर के मांस और हड्डियों को तोड़कर पूरी तरह से तोड़ देते हैं। प्रक्रिया पूरी होने के बाद शरीर एक समृद्ध, खुशबूदार और पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी में बदल जाता है, जिसे परिजनों को सौंप दिया जाता है।
शवदाह और पारंपरिक दफनाने के मुकाबले क्यों बेहतर है यह तरीका? पर्यावरण विशेषज्ञों की राय
पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार, पारंपरिक अंतिम संस्कार पद्धतियां पर्यावरण पर भारी दबाव डालती हैं। शव को जलाने (Cremation) की प्रक्रिया में बहुत अधिक ईंधन और लकड़ी का उपयोग होता है, जिससे वातावरण में बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड, पारा और विषैली गैसें निकलती हैं। वहीं दूसरी ओर, शव को दफनाने (Burial) के लिए काफी जमीन की जरूरत होती है और कॉफिन (साबुत लकड़ी के ताबूत) तथा केमिकल प्रिजर्वेटिव्स के कारण भूजल दूषित होता है। इसके विपरीत, ह्यूमन कंपोस्टिंग प्रक्रिया में न तो कोई जहरीला उत्सर्जन होता है और न ही कार्बन फुटप्रिंट बढ़ता है। यह प्रक्रिया पारंपरिक शवदाह की तुलना में लगभग 87 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन को कम करती है, जिससे यह पर्यावरण को बचाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो रहा है।
मृतक के परिजनों का क्या होता है रुख? और अंतिम संस्कार की इस नई संस्कृति पर वैश्विक बहस
प्रक्रिया के पूरा होने के बाद लगभग एक बड़ी बोरी (300 से 400 पाउंड) जितनी शुद्ध जैविक खाद तैयार होती है। इस खाद को मृतक का परिवार अपने बगीचे, पेड़-पौधों, फूलों की क्यारियों या जंगलों में पौधे लगाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है। कई परिवारों का मानना है कि यह उनके प्रियजन को हमेशा अपनी यादों और प्रकृति के रूप में जीवित रखने का एक सुंदर जरिया है। हालांकि, इस फैसले को लेकर दुनिया भर में नैतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक बहसें भी शुरू हो गई हैं। पारंपरिक ईसाई धर्मगुरुओं और सामाजिक विचारकों का तर्क है कि शरीर को मिट्टी में बदलना मानव गरिमा के खिलाफ है। इसके बावजूद, आने वाली पीढ़ियों के लिए जलवायु परिवर्तन और जगह की कमी को देखते हुए इस 'ग्रीन बुरियल' विकल्प की मांग वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रही है।