भारत के कोप से जला पाकिस्तान, 1-1 डॉलर की मांग रहा भीख , उधर 40 अरब डॉलर हुए स्वाहा
कंगाली और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान इन दिनों एक ऐसे भीषण आर्थिक संकट की आग में जल रहा है, जिससे उबर पाना उसके लिए लगभग नामुमकिन साबित हो रहा है। भारत के सख्त कूटनीतिक रुख और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिली करारी शिकस्त के बाद इस्लामाबाद की वित्तीय व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। एक तरफ जहां पाकिस्तान की हुकूमत विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए वैश्विक वित्तीय संस्थानों और मित्र देशों के आगे 1-1 डॉलर की मदद के लिए झोली फैलाकर भीख मांगने पर मजबूर है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी ढांचों, व्यापारिक नुकसान और विदेशी निवेशकों के पलायन की वजह से उसकी अर्थव्यवस्था के लगभग 40 अरब डॉलर स्वाहा हो चुके हैं। भारत की आक्रामक आर्थिक रणनीति और वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को बेनकाब करने की नीति ने उसकी कमर तोड़कर रख दी है। इस पूरे महासंकट के कारण पाकिस्तान में महंगाई, बेरोजगारी और हाहाकार का ऐसा माहौल बन चुका है जिससे वहां की जनता सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गई है।
भारत का सख्त रुख और पाकिस्तान का आर्थिक आधार ध्वस्त
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी विदेश नीति को बेहद आक्रामक और स्पष्ट बना दिया है। जब भी पाकिस्तान ने सीमा पार से प्रायोजित नापाक हरकतों या उपद्रव की कोशिश की, भारत ने उसका जवाब गोलियों से देने के साथ-साथ कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर भी दिया। भारत के इसी 'नो टॉलरेंस' रुख के कारण अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और वैश्विक निवेशकों के बीच पाकिस्तान की साख पूरी तरह खत्म हो गई। भारत के साथ व्यापार ठप्प होने, जरूरी चीजों के आयात रुकने और वैश्विक स्तर पर ब्लैकलिस्ट होने की तलवार लटकने की वजह से पाकिस्तान का व्यापारिक ढांचा देखते ही देखते ताश के पत्तों की तरह ढह गया। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान का रुपया इतिहास के सबसे निचले स्तर पर चला गया और देश का विदेशी मुद्रा भंडार शून्य के करीब पहुंचने की कगार पर खड़ा हो गया।
1-1 डॉलर की खातिर दर-दर भटक रही शहबाज हुकूमत
अर्थव्यवस्था में लिक्विडिटी की भारी कमी और कर्ज की किस्तें चुकाने में नाकाम रहने के बाद पाकिस्तान की सरकार अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (ADB) के दरवाजे खटखटा रही है। हुकूमत का हर बड़ा नुमाइंदा 1-1 डॉलर का राहत पैकेज पाने के लिए मित्र देशों के आगे गिड़गिड़ाने पर विवश है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और चीन जैसे देश भी अब पाकिस्तान की बेलगाम बयानबाजी और आर्थिक कुप्रबंधन से तंग आकर अपना खजाना खोलने से कतरा रहे हैं। बेलआउट पैकेज पाने के लिए आईएमएफ ने पाकिस्तान के सामने इतनी सख्त शर्तें रख दी हैं कि वहां आम जनता पर करों का पहाड़ टूट पड़ा है। पेट भरने और जरूरी दवाएं खरीदने तक के लिए भी विदेशी मुद्रा का संकट इस कदर गहरा गया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाकिस्तान की साख एक कर्जदार और दिवालिया मुल्क जैसी बन कर रह गई है।
40 अरब डॉलर स्वाहा, परियोजनाओं और निवेश पर फिरा पानी
पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली की कहानी केवल नए कर्ज तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके अपने खजाने से 40 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हो चुका है। विदेशी निवेशकों ने पाकिस्तान की अस्थिर स्थिति, आंतरिक अशांति और सुरक्षा की बदतर हालत को देखते हुए अपने अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट्स वापस खींच लिए हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं भी सुस्त पड़ चुकी हैं और चीन खुद अपना फंसा हुआ पैसा निकालने के रास्ते तलाश रहा है। इसके अलावा, देश में उद्योग-धंधे बंद होने, बुनियादी विकास ठप्प होने और बुनियादी बुनियादी ढांचों के चरमराने से लगभग 40 अरब डॉलर का सीधा नुकसान दर्ज किया गया है। यह वह संपत्ति और व्यापारिक अवसर थे जो हमेशा के लिए राख में तब्दील हो गए, जिसने पाकिस्तान को आने वाले कई दशकों के लिए पीछे धकेल दिया है।
कंगाली का असर: आम जनता पर टूटी कड़ाके की मार और महंगाई का तांडव
अर्थव्यवस्था के इस भीषण पतन का सबसे खौफनाक खामियाजा वहां की निर्दोष और आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। पाकिस्तान के बाजारों में आटा, दाल, दूध, पेट्रोल और रसोई गैस जैसी बुनियादी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं। देश के कई हिस्सों में गेहूं की थैलियों के लिए दंगे जैसी स्थितियां देखने को मिल रही हैं, जहाँ लोग 1-1 किलो राशन के लिए आपस में भिड़ रहे हैं। देश में बिजली की भारी कटौती, कंपनियों की तालाबंदी और नौकरियों के खत्म होने से लाखों युवा बेरोजगार हो चुके हैं। अस्पतालों में जीवन रक्षक दवाओं की कमी हो चुकी है क्योंकि सरकार के पास विदेशी दवाएं आयात करने के लिए डॉलर मौजूद ही नहीं हैं। इस भयानक मानवीय संकट के बीच पाकिस्तान की जनता अब अपनी ही हुकूमत और सेना के खिलाफ बगावत के तेवर अपना रही है।
कूटनीतिक अलगाव और आगे का काला भविष्य
भारत के इस व्यापक कूटनीतिक घेराबंदी ने पाकिस्तान को वैश्विक नक्शे पर अलग-थलग खड़ा कर दिया है। जहाँ एक तरफ भारत अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था, मजबूत तकनीक और विकास दर के बल पर दुनिया की शीर्ष आर्थिक शक्तियों में शुमार हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान आतंकवाद के पोषण और भारत विरोधी प्रोपेगैंडा की अपनी पुरानी नीति की वजह से खुद ही गड्ढे में जा गिरा है। दुनिया के तमाम विकसित देश अब यह समझ चुके हैं कि पाकिस्तान को दी जाने वाली कोई भी वित्तीय मदद उसकी नापाक नीतियों के कारण बर्बाद ही होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पाकिस्तान ने जल्द ही अपनी भारत विरोधी मानसिकता को छोड़कर अपनी आंतरिक व्यवस्था को ठीक करने की पहल नहीं की, तो 40 अरब डॉलर का यह नुकसान आने वाले समय में उसे पूरी तरह विखंडन और दिवालियापन के मुहाने पर खड़ा कर देगा।