पीएम मोदी ने किया पहलगाम का जिक्र; SCO बैठक में प्रधानमंत्री ने उठाया आतंकवाद का मुद्दा
जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीति, कड़े संदेश और क्षेत्रीय सुरक्षा की बात आती है, तो भारत हमेशा से स्पष्ट और साहसी रुख अपनाने के लिए जाना जाता है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक के दौरान एक ऐसा वाकया सामने आया जिसने पूरी दुनिया का कूटनीतिक ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सम्मेलन के मंच पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ठीक सामने मौजूद थे, और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे तौर पर आतंकवाद का गंभीर मुद्दा उठा दिया। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विशेष रूप से पहलगाम का जिक्र किए जाने से यह बैठक वैश्विक कूटनीति के गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बन गई है। यह पल न केवल भारत की आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति को पूरी दुनिया के सामने मजबूती से रखता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि भारत पड़ोसी देश की हरकतों और क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर कितना सतर्क और मुखर है।
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के इस महत्वपूर्ण मंच पर दुनिया भर के तमाम दिग्गज नेता और प्रतिनिधि जुटे हुए थे। कूटनीतिक बैठकों का माहौल आम तौर पर औपचारिक वार्ताओं और नपे-तुले बयानों तक सीमित रहता है, लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना संबोधन शुरू किया, तो उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि आतंकवाद और क्षेत्रीय शांति जैसे मुद्दों पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। बैठक कक्ष का माहौल उस वक्त और अधिक गंभीर हो गया जब भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी में आतंकवाद के नासूर पर करारा प्रहार किया। आतंकवाद को मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए पीएम मोदी ने दो टूक शब्दों में कहा कि जो देश आतंकवाद को पनाह देते हैं या अपनी जमीन का इस्तेमाल सीमा पार आतंकवाद के लिए होने देते हैं, वे कभी भी क्षेत्रीय स्थिरता और विकास का हिस्सा नहीं बन सकते। इस दौरान सीधे तौर पर पहलगाम की घटना का जिक्र करना यह साफ करता है कि भारत अपने नागरिकों के खून की एक-एक बूंद का हिसाब लेने और हर आतंकवादी साजिश को बेनकाब करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
पहलगाम का नाम लेते ही कूटनीतिक मंच पर पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के चेहरों के रंग उड़ना स्वाभाविक था। यह नाम भारत के लिए सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि उन जख्मों का प्रतीक है जो आतंकवादियों और उनके आकाओं ने देश की शांति को खंडित करने के लिए दिए थे। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में विस्तार से बताया कि कैसे सीमा पार से संचालित होने वाली आतंकी गतिविधियां न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया और एससीओ क्षेत्र की सुरक्षा के लिए नासूर बन चुकी हैं। उन्होंने दोहरे मापदंड अपनाने वाले देशों को आड़े हाथों लेते हुए स्पष्ट किया कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकती। जब तक आतंकवाद के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से नेस्तनाबूद नहीं किया जाता, तब तक किसी भी तरह के सार्थक संवाद की गुंजाइश बेहद कम है। प्रधानमंत्री का यह आक्रामक और राष्ट्रहितैषी रुख इस बात का प्रमाण है कि भारत अब कूटनीतिक मंचों पर चुप बैठने वाला नहीं है, बल्कि आंख से आंख मिलाकर अपनी बात रखने का माद्दा रखता है।
एससीओ सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी के इस कड़े रुख का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी साफ देखने को मिला। बैठक में मौजूद अन्य सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक एकजुटता की आवश्यकता पर जोर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि शहबाज शरीफ के सामने इस तरह से पहलगाम और आतंकवाद का मुद्दा उठाना भारत की एक सोची-समझी और बेहद प्रभावी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। इससे पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव तो बनता ही है, साथ ही दुनिया भर के बड़े देश भी यह समझ जाते हैं कि भारत अपनी सुरक्षा के मोर्चे पर किसी भी प्रकार के भारी दबाव या कूटनीतिक लिहाज के आगे झुकने वाला नहीं है। आतंकवाद के खात्मे के लिए भारत का यह संकल्प हर देशवासी के दिल में गर्व की भावना जगाता है। वैश्विक मंच पर जब भारत के प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया, तो पाकिस्तान के पास सफाई देने के लिए कोई तर्क नहीं बचा था, और वह पूरी दुनिया के सामने एक बार फिर बेनकाब नजर आया।
इस संपूर्ण घटनाक्रम ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि नए भारत की विदेश नीति पूरी तरह से स्पष्ट, राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाली और बेबाक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार से दुश्मन देश के शीर्ष नेतृत्व के ठीक सामने खड़े होकर पहलगाम के जख्मों और आतंकवाद की हकीकत को बयां किया, उसने यह बता दिया कि भारत अपनी रक्षा करना भली-भांति जानता है। क्षेत्रीय शांति और सहयोग के लिए मंच बना एससीओ जैसे संगठन का उपयोग आतंकवाद के खिलाफ खुली चेतावनी देने के लिए करना भारत के बढ़ते कूटनीतिक रसूख को दर्शाता है। आने वाले समय में इस घटना के भू-राजनीतिक स्तर पर दूरगामी परिणाम देखने को मिलेंगे, जिससे आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को और अधिक मजबूती मिलेगी। देश की सुरक्षा से समझौता न करने का यह संकल्प हर भारतीय को यह विश्वास दिलाता है कि देश सुरक्षित हाथों में है और आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब देना भारत की नई कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है।