जंग और तनाव के बाद पहली बार आमने-सामने की बैठक पर टिकी पूरी दुनिया की नजरें

जंग और तनाव के बाद पहली बार आमने-सामने की बैठक पर टिकी पूरी दुनिया की नजरें

जब वैश्विक राजनीति के गलियारों में तनाव और अनिश्चितता का माहौल अपनी चरम सीमा पर होता है, तब कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जो भविष्य की दिशा और दशा तय करने का माद्दा रखती हैं। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के इस बेहद महत्वपूर्ण और हाई-प्रोफाइल शिखर सम्मेलन के दौरान एक ऐसा ही कूटनीतिक पल देखने को मिला जिसने अंतरराष्ट्रीय मीडिया और रणनीतिकारों का पूरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस मंच पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान आमने-सामने आए। मध्य पूर्व में हाल ही में हुए भीषण संघर्ष, युद्ध और क्षेत्रीय अस्थिरता के बाद दोनों नेताओं की यह पहली आमने-सामने की औपचारिक बैठक थी। दुनिया भर के तमाम देशों की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि इस मुलाकात के दौरान किन अहम मुद्दों पर चर्चा होगी और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों के बीच दोनों देश किस नई रणनीति के साथ आगे बढ़ेंगे। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पेजेशकियान के बीच हुई यह वार्ता न केवल द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से बेहद खास है, बल्कि यह समकालीन वैश्विक कूटनीति का एक सबसे बड़ा और अहम मील का पत्थर साबित हो रही है।

क्षेत्रीय युद्ध के बाद पहली हाई-प्रोफाइल बैठक और वैश्विक उत्सुकता

पिछले कुछ महीनों में वैश्विक स्तर पर जो भू-राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली है, उसने मध्य एशिया और खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। जंग के उस दौर के शांत होने या थमने के बाद से कूटनीतिक चैनलों के जरिए संवाद स्थापित करने की कवायद तेज हो गई थी। ऐसे नाजुक और संवेदनशील माहौल में जब ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एससीओ के मंच पर मिले, तो हर किसी की उत्सुकता बढ़ गई। ईरान भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक कनेक्टिविटी और व्यापारिक हितों के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण साझीदार रहा है। चाबहार बंदरगाह से लेकर मध्य एशिया तक के व्यापारिक गलियारों को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से सहयोग जारी है। युद्ध और क्षेत्रीय संकट के उस दौर के तुरंत बाद दोनों शीर्ष नेताओं की यह आमने-सामने की बैठक इस बात का प्रतीक है कि भारत और ईरान आपसी बातचीत के जरिए कूटनीतिक रिश्तों को और अधिक मजबूत और स्थिर बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी पर केंद्रित रही द्विपक्षीय वार्ता

इस उच्च स्तरीय मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच कई अहम और रणनीतिक मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई। बैठक में मुख्य रूप से क्षेत्रीय शांति, आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई, ऊर्जा सुरक्षा और द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने जैसे विषय छाए रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत हमेशा से क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी संवाद का पक्षधर रहा है। वहीं, ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान ने भी भारत के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का हवाला देते हुए आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की इच्छा जताई। चाबहार प्रोजेक्ट के विकास और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) को तेजी से आगे बढ़ाने को लेकर दोनों पक्षों के बीच सकारात्मक बातचीत हुई। जानकारों का मानना है कि युद्ध के बाद उपजे आर्थिक और ऊर्जा संकट से निपटने के लिए भारत और ईरान का यह सहयोग न केवल दोनों देशों के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह पूरे दक्षिण और मध्य एशिया में स्थिरता लाने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा।

वैश्विक पटल पर भारत की कूटनीतिक संतुलन नीति की सफलता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की यह सबसे बड़ी विशेषता रही है कि वे हर देश के साथ संतुलित, स्वतंत्र और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाले संबंध बनाए रखते हैं। एक तरफ जहां भारत पश्चिमी देशों और रूस के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते मजबूत कर रहा है, वहीं ईरान जैसे रणनीतिक साझीदारों के साथ भी संवाद के दरवाजे हमेशा खुले रखे गए हैं। एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान पेजेशकियान के साथ हुई यह मुलाकात इस बात का जीवंत उदाहरण है कि भारत बिना किसी बाहरी दबाव के अपने क्षेत्रीय और वैश्विक हितों को साधना अच्छी तरह जानता है। पश्चिमी एशिया में तनाव के बावजूद भारत ने जिस परिपक्वता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया है, उसने वैश्विक समुदाय के बीच भारत के कद को और अधिक ऊंचा कर दिया है। दुनिया के तमाम बड़े देश अब यह मान चुके हैं कि भारत वैश्विक शांति और स्थिरता का एक सबसे मजबूत और विश्वसनीय स्तंभ बन चुका है।

भविष्य के भू-राजनीतिक समीकरण और इस मुलाकात के दूरगामी परिणाम

एससीओ समिट में हुई मोदी और पेजेशकियान की यह मुलाकात आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों पर गहरा असर डालेगी। जिस प्रकार से दोनों नेताओं ने आपसी विश्वास को मजबूत करने और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है, उससे यह साफ हो गया है कि आतंकवाद, आर्थिक अनिश्चितता और क्षेत्रीय संघर्षों का मुकाबला करने के लिए आपसी एकजुटता कितनी जरूरी है। पाकिस्तान और चीन की सीमा से सटे इस पूरे क्षेत्र में भारत और ईरान के बीच बढ़ती यह प्रगाढ़ता रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में अहम साबित होगी। यह बैठक इस बात का संदेश देती है कि कठिन समय में भी संवाद का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए, क्योंकि बातचीत से ही हर जटिल समस्या का स्थायी समाधान निकल सकता है। इतिहास के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर हुई यह हाई-प्रोफाइल मुलाकात आने वाले दिनों में कूटनीति के नए आयाम गढ़ेगी और भारत-ईरान के रिश्तों को एक नई मजबूती प्रदान करेगी।