ईरान पर अमेरिकी परमाणु हमले की आशंका: भारत के इन 4 राज्यों पर क्या पड़ेगा असर, जानिए वैज्ञानिक और आर्थिक विश्लेषण
पश्चिम एशिया में वाशिंगटन और तेहरान के बीच बढ़ता तनाव अब उस नाजुक मोड़ पर पहुंच चुका है जहां परमाणु टकराव की आशंकाएं अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा रही हैं। अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में मिडटर्म नतीजों के बाद उपजी तल्खी और ईरान को परमाणु क्षमता हासिल करने से रोकने की अमेरिकी प्रतिबद्धता के बीच इसफाहान के भूमिगत ग्रेनाइट बंकरों और पिकैक्स माउंटेन पर संभावित हमलों की रणनीतिक चर्चाएं तेज हैं। भारत के लिए यह तनाव केवल राजनयिक सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि वायुमंडलीय भूगोल, ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी में मौजूद 80 लाख प्रवासियों की वजह से यह सीधे तौर पर देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
इन राज्यों पर पड़ेगा असर
वायुमंडलीय विज्ञान के दृष्टिकोण से मध्य अक्षांशों पर 10 से 12 किलोमीटर की ऊंचाई पर बहने वाली सब्ट्रॉपिकल वेस्टरली जेट स्ट्रीम हवाएं हमेशा पश्चिम से पूर्व की ओर गति करती हैं। यदि मध्य ईरान के परमाणु या रणनीतिक ठिकानों पर कोई बड़ा विस्फोट होता है, तो वायुमंडल में उठने वाला रेडियोएक्टिव गुबार इन्हीं पश्चिमी जेट स्ट्रीम के साथ अफगानिस्तान और पाकिस्तान के ऊपर से गुजरते हुए भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की ओर बढ़ सकता है। इस प्रवाह के चलते भारत के चार प्रमुख सीमावर्ती राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सीधे रास्ते में आते हैं: गुजरात अपनी समुद्री और सिंध सीमा के कारण, राजस्थान अपने थार रेगिस्तान से सटे बाड़मेर, जैसलमेर और बीकानेर के क्षेत्रों के चलते, पंजाब अपने सर्दियों के पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव मार्ग में होने की वजह से, और जम्मू-कश्मीर अपनी अधिक ऊंचाई व जेट स्ट्रीम के सीधे संपर्क के कारण। इनके अलावा पंजाब और राजस्थान से सीमा साझा करने वाला हरियाणा भी वायुमंडलीय धुंध के दायरे में आ सकता है।
हालांकि, रक्षा वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को सीधे तौर पर प्राणघातक रेडिएशन सिकनेस का सामना करने की संभावना बेहद कम है। सेंट्रल ईरान और भारत के पश्चिमी छोर के बीच 2,000 से 2,500 किलोमीटर की विशाल भौगोलिक दूरी एक कुदरती ढाल का काम करती है। परमाणु विस्फोट से निकलने वाले भारी और मोटे रेडियोएक्टिव कण लंबी दूरी तय किए बिना शुरुआती सैकड़ों किलोमीटर के भीतर ही जमीन पर गिर जाते हैं, जबकि बारीक कण हजारों किलोमीटर के सफर में वायुमंडल में इतने व्यापक रूप से बिखर जाते हैं कि भारतीय सीमा तक पहुंचते-पहुंचते उनकी तीव्रता काफी क्षीण हो जाती है।
असली और गंभीर संकट हवा की तुलना में समुद्री पारिस्थितिकी और जल-संसाधनों पर मंडरा सकता है। यदि फारस की खाड़ी अथवा उत्तर अरब सागर के तटीय इलाकों में रेडियोएक्टिव अपशिष्ट घुलता है, तो खाड़ी देशों के समुद्री जल शोधन (डिसेलिनेशन) संयंत्र सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। समुद्री धाराओं के जरिए यह संदूषण अरब सागर तक फैल सकता है, जिससे भारत के पश्चिमी तटवर्ती राज्यों गुजरात और महाराष्ट्र के समुद्री खाद्य तंत्र, तटीय पारिस्थितिकी और स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर दीर्घकालिक नकारात्मक असर पड़ने का जोखिम पैदा हो सकता है।
इस संभावित संकट का सबसे तात्कालिक और विध्वंसक असर भारत की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा। भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से अधिक कच्चा तेल आयात करता है और इस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा संकरे जलमार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से होकर गुजरता है। युद्ध या परमाणु तनाव के चलते यह मार्ग बाधित होने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकती हैं, जिससे घरेलू स्तर पर ईंधन के दाम और महंगाई अनियंत्रित हो जाएगी। इसके साथ ही खाड़ी देशों में कार्यरत 80 लाख से अधिक भारतीय नागरिकों की सुरक्षा, उनका सुरक्षित रेस्क्यू और उनसे मिलने वाले अरबों डॉलर के विदेशी मुद्रा प्रेषण (रेमिटेंस) का अचानक थम जाना भारतीय खजाने और कूटनीति के लिए इतिहास की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाएगा। ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत के रणनीतिक निवेश पर ब्रेक लगने और रुपये पर दबाव बढ़ने से चालू खाता घाटा गंभीर रूप ले सकता है, जिससे यह पूरा भू-राजनीतिक परिदृश्य भारत के लिए एक बहुआयामी चुनौती प्रस्तुत करता है।