UN ने भारत ने जताई नाराजगी, मानवाधिकार रिपोर्ट पर खड़े किए सवाल; पूछा- पैमाना अलग-अलग क्यों?

UN ने भारत ने जताई नाराजगी, मानवाधिकार रिपोर्ट पर खड़े किए सवाल; पूछा- पैमाना अलग-अलग क्यों?

विश्व पटल पर भारत ने एक बार फिर अपनी संप्रभुता और लोकतांत्रिक मर्यादा का मजबूती से बचाव करते हुए संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानवाधिकार कार्यालय की रिपोर्ट और टिप्पणियों पर तीखा हमला बोला है। विदेश मंत्रालय ने मानवाधिकारों के नाम पर वैश्विक मंच से भारत के आंतरिक मामलों में की जा रही टिप्पणी पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। भारत सरकार ने यह साफ कर दिया है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था को देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका और संवैधानिक ढांचे की अनदेखी करके पूर्वाग्रह से ग्रसित बयान जारी करने का अधिकार नहीं है। इस पूरे मामले में भारतीय विदेश मंत्रालय ने पूछा कि जब दुनिया के अन्य हिस्सों में मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन होता है, तब संयुक्त राष्ट्र की आंखें क्यों बंद हो जाती हैं और भारत के संदर्भ में अलग-अलग पैमाने क्यों इस्तेमाल किए जाते हैं?

वैश्विक मंच पर भारत का कड़ा प्रहार: बिना तथ्यों की रिपोर्टिंग पर उठाए गंभीर सवाल

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) द्वारा जारी की गई टिप्पणियों और संदर्भों में भारत के आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से निपटने के तरीकों पर सवाल खड़े किए गए थे। इसके जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बेहद कड़े और सटीक शब्दों में कहा कि वैश्विक स्तर पर मानवाधिकार संस्थाओं का रवैया अब निष्पक्ष न रहकर चुनिंदा और पक्षपातपूर्ण होता जा रहा है। भारत ने स्पष्ट किया कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को संविधान के तहत अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्राप्त है। हालांकि, इस स्वतंत्रता का प्रयोग कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के दायरे में ही किया जा सकता है। भारतीय सुरक्षा बल और प्रशासन हमेशा कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करते हैं और यदि किसी को आपत्ति हो, तो देश की स्वतंत्र एवं सशक्त न्यायपालिका सबके लिए समान रूप से उपलब्ध है।

दोहरे मापदंड और चयनात्मक रवैये पर विदेश मंत्रालय का सीधा हमला

विदेश मंत्रालय के आधिकारिक वक्तव्य में इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया गया कि वैश्विक मानवाधिकार निकाय अक्सर बिना जमीनी हकीकत को समझे या बिना पूरे तथ्य जांचे जल्दबाजी में बयानबाजी करते हैं। भारत ने कहा कि जब पड़ोसी देशों या पश्चिमी दुनिया में बड़े पैमाने पर हिंसा, दमन और विरोध प्रदर्शनों को दबाया जाता है, तब मानवाधिकार कार्यालय मौन साध लेता है या बहुत नरम रुख अपनाता है। लेकिन जैसे ही भारत का मामला आता है, वैसे ही पूर्वाग्रह से ग्रसित रिपोर्ट तैयार कर दी जाती हैं। भारत सरकार ने इसे एक तरह का कूटनीतिक दोहरा मापदंड (Double Standards) करार देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों के संरक्षण का उद्देश्य केवल तभी पूरा हो सकता है जब सभी देशों के साथ समान, वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष रवैया अपनाया जाए।

लोकतंत्र, स्वतंत्र न्यायपालिका और भारत के संवैधानिक सुरक्षा कवच की मजबूत ढाल

भारतीय प्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से यह याद दिलाया कि भारत केवल एक लोकतंत्र नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की जननी है। भारत का संविधान अपने हर नागरिक को पूर्ण सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और विचार व्यक्त करने का अधिकार प्रदान करता है। यहाँ प्रेस की स्वतंत्रता, जागरूक नागरिक समाज (Civil Society) और सर्वोच्च न्यायालय से लेकर स्थानीय अदालतों तक का एक सुदृढ़ ढांचा मौजूद है, जो किसी भी स्थिति में मानवाधिकारों के हनन को रोकने के लिए सक्षम और तत्पर रहता है। ऐसी स्थिति में किसी बाहरी निकाय द्वारा बिना किसी ठोस साक्ष्य के भारत के आंतरिक मामलों में गैर-ज़रूरी हस्तक्षेप करना (Unwarranted Interference) और देश की छवि को धूमिल करने की कोशिश करना पूरी तरह से अस्वीकार्य और निंदनीय है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति पर इस गतिरोध का क्या होगा असर?

भारत के इस आक्रामक और स्पष्ट रुख से अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में एक नया संवाद छिड़ गया है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि भारत का यह रुख केवल इस एक रिपोर्ट का जवाब नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ (Global South) की उस बुलंद आवाज का प्रतिनिधित्व करता है जो पश्चिमी और अंतरराष्ट्रीय निकायों के पक्षपातपूर्ण रवैये का विरोध करती आई है। भारत ने हमेशा मानवाधिकार परिषद (UNHRC) और संयुक्त राष्ट्र के साथ रचनात्मक सहयोग का समर्थन किया है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि रचनात्मक जुड़ाव की आड़ में देश की संप्रभुता पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। भारत की इस सख्त प्रतिक्रिया से यह संदेश साफ हो गया है कि भविष्य में किसी भी निराधार या बिना सत्यापित दावों पर अंतरराष्ट्रीय निकायों को भारत के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।

वैश्विक संस्थाओं की निष्पक्षता और साख पर मंडराते बड़े प्रश्नचिह्न

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार निकाय की कार्यप्रणाली, स्वतंत्रता और वस्तुनिष्ठता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब अंतरराष्ट्रीय संगठन अपने मूल सिद्धांतों से भटककर किसी खास एजेंडे या आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर बयान जारी करते हैं, तो इससे उनकी खुद की विश्वसनीयता और साख को भारी नुकसान पहुंचता है। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र से आग्रह किया है कि वह मानवाधिकारों की रक्षा के अपने मूल जनादेश पर ध्यान केंद्रित करे और किसी भी देश के खिलाफ राजनीतिक रूप से प्रेरित या चुनिंदा रिपोर्टिंग करने से परहेज करे, ताकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में निष्पक्षता और आपसी विश्वास बना रहे।