ट्रंप देखते रह गए, जानें कौन हैं नावी पिल्लै जिनको मिला नोबेल शांति पुरस्कार

ट्रंप देखते रह गए, जानें कौन हैं नावी पिल्लै जिनको मिला नोबेल शांति पुरस्कार

नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में नोबेल शांति पुरस्कार 2026 का आधिकारिक ऐलान कर दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकारों की रक्षा और युद्ध पीड़ितों को न्याय दिलाने में जीवन खपाने वाली भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी जज नवनेथम 'नावी' पिल्लै के नाम पर नोबेल कमेटी ने अंतिम मुहर लगाई है। अमेरिका के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप सहित दुनिया भर के कई बड़े नाम इस दौड़ में शामिल थे, लेकिन जूरी ने 85 वर्षीय नावी पिल्लै के छह दशक लंबे साहसिक कानूनी संघर्ष को सर्वोच्च सम्मान के लिए चुना। पिल्लै ने शक्तिशाली हुकूमतों और तानाशाहों को मानवाधिकार हनन पर हमेशा कठघरे में खड़ा किया और अंतरराष्ट्रीय कानून को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा।

नावी पिल्लैं के बारे में जानें

नावी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था, जब देश रंगभेद की क्रूर व्यवस्था से झुलस रहा था। गंभीर सामाजिक पाबंदियों और संसाधनों के अभाव के बावजूद उन्होंने वकालत की पढ़ाई पूरी की और 1967 में प्रैक्टिस शुरू की। वह दक्षिण अफ्रीका के नटाल प्रांत में अपनी निजी कानूनी प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली गैर-श्वेत महिला वकील बनीं। इस दौर में जब रंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया जाता था, तब उन्होंने राजनीतिक बंदियों के मानवाधिकारों की अदालत में निडरता से पैरवी की। उनका मानना था कि जेल में बंद होने से किसी इंसान की गरिमा और मौलिक अधिकार खत्म नहीं हो जाते।

पिल्लै के कानूनी सफर का सबसे युगांतरकारी अध्याय 1994 के रवांडा नरसंहार से जुड़ा है। लाखों बेगुनाहों के कत्लेआम के जिम्मेदार अपराधियों को सजा दिलाने के लिए बने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR) में उन्हें 1995 में जज नियुक्त किया गया और 1999 से 2003 तक वह इसकी अध्यक्ष रहीं। इस दौरान जीन-पॉल अकायेसु के ऐतिहासिक मामले की सुनवाई करते हुए उनकी पीठ ने विश्व इतिहास में पहली बार यह कानूनी मिसाल तय की कि युद्ध और संघर्ष के दौरान महिलाओं से किया गया बलात्कार व यौन हिंसा केवल अपराध नहीं, बल्कि सीधे तौर पर 'नरसंहार' (Genocide) का हिस्सा है।

रवांडा में मिसाल कायम करने के बाद पिल्लै 2003 में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की जज बनीं। साल 2008 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने उन्हें मानवाधिकार उच्चायुक्त (UN High Commissioner for Human Rights) का अहम दायित्व सौंपा। अगस्त 2014 तक इस सर्वोच्च वैश्विक पद पर रहते हुए उन्होंने बिना किसी राजनीतिक दबाव के कमजोरों, युद्ध पीड़ितों और शोषितों के हक में पूरी दुनिया में आवाज बुलंद की।

नावी पिल्लै की इस वैश्विक उपलब्धि के पीछे भारत और तमिलनाडु से जुड़ा एक गहरा और भावुक इतिहास है। करीब 130 साल पहले, 1890 के दशक में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान उनके दादा-दादी को तमिलनाडु से अनुबंधित मजदूर (गिरमिटिया) बनाकर दक्षिण अफ्रीका के डरबन ले जाया गया था, जहां उन्होंने गन्ने के खेतों में कड़ी मजदूरी की। उनके पिता नरैनसामी नायडू एक साधारण बस चालक थे और घर का खर्च चलाने के लिए समुद्र में मछली भी पकड़ते थे, जबकि मां संथामा नायडू एक गृहिणी थीं।

नरैनसामी और संथामा के आठ बच्चों में नावी पांचवें नंबर पर थीं। अभावों के बावजूद माता-पिता ने बेटियों की उच्च शिक्षा सुनिश्चित की। 1962 में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात भारतीय मूल के रंगभेद विरोधी वकील परंजोती गैबी एंथनी पिल्लै से हुई और 1965 में दोनों परिणय सूत्र में बंधे, जिसके बाद उनका नाम नायडू से पिल्लै हो गया। स्वर्गीय गैबी पिल्लै और नावी की दो बेटियां हैं। तमिलनाडु के एक गिरमिटिया मजदूर परिवार से निकलकर वैश्विक शांति और न्याय के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने तक का उनका यह सफर पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है।