ट्रंप का इशारा मिलते ही ईरान पर टूटेगी अमेरिकी सेना, 96 घंटे का अल्टीमेटम, फिर भी अटैक से क्यों डरा US?

ट्रंप का इशारा मिलते ही ईरान पर टूटेगी अमेरिकी सेना, 96 घंटे का अल्टीमेटम, फिर भी अटैक से क्यों डरा US?

मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में युद्ध के बादल एक बार फिर गहरे हो गए हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए गए 96 घंटे के अल्टीमेटम के बाद पेंटागन ने फारस की खाड़ी में अपनी सैन्य मौजूदगी को उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है। अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोत, फाइटर जेट्स और मिसाइल डिफेंस सिस्टम ईरान की घेराबंदी के लिए तैनात कर दिए गए हैं। वाशिंगटन से हरी झंडी मिलते ही अमेरिकी सेना ईरान के सामरिक और परमाणु ठिकानों पर बड़ा हमला बोलने के लिए तैयार है। हालांकि, इस भारी सैन्य तैनाती और सख्त बयानों के बावजूद अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ और पेंटागन के शीर्ष अधिकारी इस हमले के संभावित नतीजों को लेकर बेहद चिंतित नजर आ रहे हैं।

हमले के लिए सेना तैयार, फिर भी ईरान पर सीधा अटैक करने से क्यों हिचकिचा रहा है अमेरिका?

कागजों पर और सैन्य ताकत के मामले में अमेरिका भले ही ईरान से काफी आगे हो, लेकिन धरातल पर स्थिति बेहद जटिल है। पेंटागन के रणनीतिकारों को भली-भांति पता है कि ईरान कोई साधारण देश नहीं है। ईरान के पास मध्य पूर्व का सबसे बड़ा और आधुनिक मिसाइल नेटवर्क है। यदि अमेरिका हमला करता है, तो ईरान अपनी हाइपरसोनिक और बैलिस्टिक मिसाइलों से पूरे क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को पल भर में निशाना बना सकता है। इसके अलावा, इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में मौजूद ईरान समर्थक सशस्त्र समूह (Axis of Resistance) एक साथ अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हमला बोल देंगे, जिससे इस युद्ध को संभालना वाशिंगटन के लिए असंभव सा हो जाएगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर तबाही का खतरा

अमेरिका के डर की सबसे बड़ी वजहों में से एक विश्व अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला इसका भयावह असर है। ईरान की भौगोलिक स्थिति रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, विशेषकर 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz), जहां से दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। यदि युद्ध छिड़ता है, तो ईरान इस समुद्री रास्ते को पूरी तरह से बंद कर सकता है। ऐसा होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच जाएंगी, जिससे अमेरिका सहित दुनिया भर के विकसित और विकासशील देशों में ऐतिहासिक महंगाई और आर्थिक मंदी का दौर शुरू हो जाएगा।

क्षेत्रीय सहयोगियों की सुरक्षा और इजरायल-सऊदी अरब का असमंजस

डोनाल्ड ट्रंप की सख्त बयानबाजी के बावजूद, अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगी जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर भी इस सीधे युद्ध के पक्ष में नहीं दिख रहे हैं। खाड़ी देशों को डर है कि अमेरिका और ईरान की जंग में उनके तेल कुएं, रिफाइनरियां और आधुनिक शहर ईरानी मिसाइलों के सीधे निशाने पर आ जाएंगे। यहां तक कि इजरायल भी जानता है कि हिजबुल्लाह और ईरान की मिसाइलें उसके रक्षा कवच को भेद सकती हैं। यही वजह है कि 96 घंटे का अल्टीमेटम बीतने के कगार पर होने के बावजूद अमेरिकी प्रशासन केवल सैन्य दबाव बनाकर ईरान को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि एक पूर्णकालिक युद्ध पूरे मध्य पूर्व को तबाह कर सकता है।