अचानक क्यों पड़ी दुनिया के सबसे अमीर देश सऊदी अरब को इस्लामिक नाटो की जरूरत
पवित्र शहर मक्का यूं तो दुनियाभर के करोड़ों मुसलमानों के लिए आस्था और रूहानी सुकून का सबसे बड़ा केंद्र है, इन दिनों पूरी दुनिया और तमाम वैश्विक धर्मों के बीच एक बेहद सनसनीखेज भू-राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन चुका है। पिछले हफ्ते पश्चिम एशिया की धरती पर एक ऐसा बड़ा घटनाक्रम हुआ जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है।
सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान इन तीनों प्रमुख मुस्लिम देशों ने मिलकर एक ऐतिहासिक रक्षा समझौते पर आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर किए हैं। मक्का में जब इन तीनों मुल्कों के शीर्ष नेतृत्व ने इस गोपनीय और महत्वपूर्ण दस्तावेज पर दस्तखत किए, तो यह केवल एक सामान्य सैन्य या रक्षा समझौता भर नहीं था, बल्कि यह पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की बदलती हुई तस्वीर और नए भू-राजनीतिक समीकरणों पर खींची गई एक बेहद गहरी लकीर थी।
क्या है 'इस्लामिक नाटो' का पूरा सच और इस नए गठबंधन की मुख्य बातें?
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान तीनों के भूगोल बिल्कुल अलग हैं, उनकी रणनीतिक प्राथमिकताएं और हित भी भिन्न हैं, लेकिन इन सबके बावजूद इनका यह साझा ऐलान कि अब 'उनमें से किसी एक देश पर हमला हुआ तो उसका जवाब सिर्फ एक देश नहीं बल्कि तीनों मिलकर देंगे', दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों के कान खड़े कर चुका है।
इस नए और अनौपचारिक सैन्य गठबंधन को दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञ अनाधिकारिक तौर पर 'इस्लामिक नाटो' (Islamic NATO) का नाम दे रहे हैं। इस समझौते के तहत जो प्रमुख बातें तय की गई हैं, उनके मुताबिक यदि तीनों देशों में से किसी पर भी बाहरी आक्रमण होता है, तो वे एक-दूसरे की रक्षा में पूरी ताकत झोंक देंगे। इसके अलावा सेना, हथियारों, सैन्य ट्रेनिंग और युद्ध की तैयारियों के मामले में आपसी सहयोग को अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ाया जाएगा।
ड्रोन निर्माण, आधुनिक मिसाइल तकनीक और अन्य अत्याधुनिक सैन्य उपकरणों के मामले में भी तकनीकी साझेदारी मजबूत होगी, किसी भी बड़े खतरे से निपटने के लिए संयुक्त रणनीति बनाई जाएगी, और सबसे खास बात यह है कि इस गठबंधन में पाकिस्तान की परमाणु शक्ति इसे एक बेहद संवेदनशील और खास रणनीतिक वजन देती है, हालांकि तुर्की का पुराना नाटो (NATO) संगठन से नाता इस समझौते की वजह से बिल्कुल नहीं टूटेगा।
सऊदी अरब जैसे ताकतवर और अमीर देश को अचानक इस सैन्य समझौते की क्यों पड़ी जरूरत?
आम लोगों के जहन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अपार तेल संपदा के मालिक, आधुनिक हथियारों से लैस और दुनिया की सबसे ताकतवर महाशक्ति अमेरिका का प्रत्यक्ष सुरक्षा कवच प्राप्त होने के बावजूद आखिर सऊदी अरब को इस तरह के नए गठबंधन की जरूरत क्यों महसूस हुई? इसके पीछे हाल ही में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच लगातार बढ़ता हुआ घातक तनाव और क्षेत्र में हुए भीषण हमले हैं, जिसके चलते सऊदी अरब ने खुद को काफी हद तक असुरक्षित महसूस किया है।
युद्ध के इस दौर में सऊदी अरब को ईरान और ईरान समर्थित इराकी मिलिशिया व हूती विद्रोहियों द्वारा लगातार निशाना बनाया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स और रक्षा विश्लेषणों में यहां तक दावा किया गया है कि इस मौजूदा संघर्ष के दौरान सऊदी अरब के पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों के भंडार में भारी कमी यानी करीब 86 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है।
इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य के बाधित होने से सऊदी की आर्थिक जीवनरेखा को तगड़ा झटका लगा है और इन तमाम युद्धों ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की महत्वाकांक्षी 'NEOM परियोजना' तथा 'Vision 2030' को भी गहरे संकट में डाल दिया है, जिससे निवेशकों का भरोसा डगमगाया है। ऐसे में अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त करने और अपनी बहु-अरब डॉलर की मेगा प्रोजेक्ट्स को सुरक्षित रखने के लिए सऊदी सत्तारूढ़ परिवार को एक अचूक सुरक्षा कवच की सख्त दरकार थी, जो उसे इस नए समझौते के रूप में मिला है।