आर्कटिक की पिघलती बर्फ से मालामाल होगा रूस या घर बैठे मिलेगी तबाही
धरती के उत्तर छोर यानी आर्कटिक क्षेत्र (Arctic Region) में जलवायु परिवर्तन के कारण जिस तेजी से विशालकाय बर्फ की परतें पिघल रही हैं, उसने दुनिया के सबसे बड़े देशों के बीच एक नए और खतरनाक भू-राजनीतिक संघर्ष को जन्म दे दिया है। रूस (Russia) के लिए यह पिघलती हुई बर्फ सदियों पुरानी उस उम्मीद के सच होने जैसी है, जिसके जरिए वह इस क्षेत्र में छिपे अरबों-खरबों डॉलर के खनिज तेल, प्राकृतिक गैस और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth Minerals) तक अपनी सीधी पहुंच बनाकर दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक महाशक्ति बन सकता है। इसके अलावा, आर्कटिक के जलमार्गों के खुलने से एशिया और यूरोप के बीच समुद्री व्यापार का सफर भी काफी छोटा हो जाएगा, जिससे मास्को को भारी आर्थिक लाभ मिलने की पूरी संभावना है। लेकिन दूसरी तरफ, रूस की इस बढ़ती आक्रामक सैन्य और आर्थिक गतिविधियों को देखकर पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो (NATO) की नींद उड़ चुकी है। अमेरिका, कनाडा और यूरोपीय देशों को अब इस बात का सबसे बड़ा डर सता रहा है कि यदि आर्कटिक पर रूस का पूरी तरह से नियंत्रण हो गया, तो यह पश्चिमी दुनिया की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा और घातक दुश्मन साबित होगा, जिसके चलते इस ठंडी और वीरान बर्फ की चादर के नीचे एक नई वैश्विक जंग के बादल मंडराने लगे हैं।
आर्कटिक के खजाने पर कब्जे की जंग: रूस का सिबेरियन विस्तार और अमेरिका-नाटो की बढ़ती चिंताएं
रूस ने पिछले कुछ वर्षों में आर्कटिक सर्कल के भीतर अपने सैन्य अड्डों का तेजी से पुनरुद्धार किया है, आधुनिक आइसब्रेकर जहाजों का बेड़ा तैयार किया है और परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ा दी है। मास्को का साफ कहना है कि आर्कटिक उसका प्राकृतिक पिछवाड़ा है और वहां के संसाधनों पर उसका पहला अधिकार बनता है। लेकिन वाशिंगटन और ब्रुसेल्स में बैठे नाटो के रणनीतिकार रूस के इन मंसूबों को पश्चिमी सीमाओं के लिए एक सीधा खतरा मानकर चल रहे हैं। उत्तरी ध्रुव के इस ठंडे इलाके में तेल और गैस के विशाल भंडार छिपे होने के कारण रूस के अलावा नॉर्वे, डेनमार्क, कनाडा और अमेरिका भी अपने-अपने दावों को मजबूत करने में जुटे हैं। जैसे-जैसे ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ पिघलती जा रही है, वैसे-वैसे अंतरराष्ट्रीय नौवहन मार्ग खुलते जा रहे हैं, जिन पर नियंत्रण पाने के लिए दुनिया की दो बड़ी महाशक्तियां आमने-सामने आ चुकी हैं। नाटो के हालिया रक्षा दस्तावेजों में भी इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती रणनीतिक साझेदारी को रोकने के लिए पश्चिमी देशों को संयुक्त रूप से अपनी सैन्य उपस्थिति और खुफिया निगरानी को तुरंत और अधिक मजबूत करना होगा।
जलवायु परिवर्तन की विभीषिका या मुनाफे का सौदा: पर्यावरणविदों ने दी दुनिया को भयानक चेतावनी
एक तरफ जहां रूस और नाटो के देश आर्कटिक की पिघलती बर्फ को अपने रणनीतिक और आर्थिक मुनाफे के चश्मे से देख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया भर के पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों ने इसे मानव जाति के लिए सबसे बड़ी चेतावनी करार दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आर्कटिक की बर्फ का तेजी से पिघलना न केवल समुद्र के जलस्तर को खतरनाक रूप से बढ़ा देगा, जिससे दुनिया के तटीय शहर डूबने की कगार पर आ जाएंगे, बल्कि इसके भीतर जमा मीथेन गैस और अन्य ग्रीनहाउस गैसें बाहर निकलकर ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार को कई गुना बढ़ा देंगी। इसके अलावा, इस क्षेत्र के मूल पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem), ध्रुवीय भालुओं और सील मछलियों का जीवन पूरी तरह खतरे में पड़ चुका है। लेकिन कूटनीति और महाशक्ति बनने की इस अंधी दौड़ में शामिल देश पर्यावरण के इन खतरों को दरकिनार कर केवल इस बात पर लड़ रहे हैं कि आने वाले भविष्य में इस जमी हुई दुनिया का असली सुल्तान कौन बनेगा।
नाटो और रूस के बीच बढ़ती सैन्य सुगबुगाहट: क्या उत्तरी ध्रुव बन जाएगा तीसरे विश्व युद्ध का अखाड़ा?
आर्कटिक क्षेत्र में जिस प्रकार से दोनों पक्षों की ओर से युद्धपोतों, लड़ाकू विमानों और रडार स्टेशनों की तैनाती बढ़ाई जा रही है, उससे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों में यह डर बैठ गया है कि यह बर्फीला रेगिस्तान कहीं भविष्य के किसी बड़े संघर्ष का केंद्र न बन जाए। नाटो देशों ने अब 'आर्कटिक डिफेंस एक्सरसाइज' के नाम पर अपनी सैन्य टुकड़ियों को उत्तरी ध्रुव की चरम ठंड और कठिन परिस्थितियों में युद्ध लड़ने का कड़ा प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है। रूस भी अपनी अत्याधुनिक मिसाइल प्रणालियों के जरिए किसी भी पश्चिमी दखल का मुंहतोड़ जवाब देने की पूरी तैयारी में बैठा है। आर्थिक तंगी से जूझते रूस के लिए यह आर्कटिक का खजाना उसके भविष्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ साबित हो सकता है, यही वजह है कि वह अपनी सुरक्षा से किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं है। कुल मिलाकर, आर्कटिक की पिघलती हुई यह बर्फ न केवल रूस के लिए मालामाल होने का जरिया बन सकती है, बल्कि यह पूरी मानवता और वैश्विक शांति के लिए नाटो के साथ एक नए और भीषण युद्ध की सुलगती हुई चिंगारी भी साबित हो सकती है।