मिड टर्म इलेक्शन में एक हफ्ता बाकी, आखिरी पोल में ट्रंप के लिए आ गई सबसे बड़ी बैड न्यूज

मिड टर्म इलेक्शन में एक हफ्ता बाकी, आखिरी पोल में ट्रंप के लिए आ गई सबसे बड़ी बैड न्यूज

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में ड्रैगन यानी चीन का दोगलापन एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो गया है। एक तरफ चीन अपने ही पड़ोसी देशों की सीमाओं पर अवैध कब्जे करने, उनकी संप्रभुता को चुनौती देने और दक्षिण चीन सागर (South China Sea) से लेकर लद्दाख तक दादागिरी और बुली (Bullying) करने से बाज नहीं आता, वहीं दूसरी तरफ वही चीन वैश्विक मंच पर खुद को मानवाधिकारों और छोटे देशों का मसीहा साबित करने का ढोंग कर रहा है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन ने कम्युनिस्ट देश क्यूबा पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों की कड़ी निंदा करते हुए उसे अमेरिका के दबाव से बचाने का राग अलापा है। चीन के इस विरोधाभासी और हास्यास्पद कदम को दुनिया भर के कूटनीतिक विशेषज्ञ ड्रैगन का बड़ा ढोंग और अपने विस्तारवादी एजेंडे को चमकाने का घटिया पैंतरा मान रहे हैं।

भारत से लेकर वियतनाम और फिलीपींस तक: कैसे अपने हर पड़ोसी को सताता है चीन

चीन का इतिहास गवाह है कि उसकी विस्तारवादी और आक्रामक नीतियां हमेशा से अपने पड़ोसी मुल्कों के अस्तित्व के लिए खतरा बनी रही हैं। भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी सीमा विवाद हो, या फिर दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और इंडोनेशिया के समुद्री इलाकों पर अवैध दावेदारी, चीन ने हर बार अंतरराष्ट्रीय कानूनों और ट्रिब्यूनल्स के फैसलों को ठुकराया है। ताइवान की स्वतंत्रता को लगातार सैन्य धमकियों से दबाना और जापान के सेनकाकू द्वीप पर घुसपैठ की नापाक हरकतें करना चीन की रोजाना की फितरत बन चुका है। छोटे और कमजोर पड़ोसी देशों को अपने कर्ज के जाल (Debt Trap Infrastructure) में फंसाकर उनकी जमीनों पर कब्जा करना और फिर उन पर दबाव बनाना ड्रैगन की स्थापित रणनीति है। ऐसे में जो देश खुद अपने पड़ोसियों के लिए सिरदर्द बना हुआ है, उसका अचानक किसी दूसरे देश की आजादी और संप्रभुता का हमदर्द बनना हास्यास्पद है।

क्यूबा का समर्थन या अमेरिका के खिलाफ अपनी राजनीतिक और रणनीतिक गोटियां बिछाना

क्यूबा पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों (US Sanctions) का विरोध करने के पीछे चीन की कोई मानवीय या नैतिक सोच नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से उसकी भू-राजनीतिक (Geopolitical) साजिश का हिस्सा है। लैटिन अमेरिका और कैरीबियाई क्षेत्र को अमेरिका का पिछवाड़ा माना जाता है, और चीन कई सालों से क्यूबा में भारी निवेश करके वहां अपना जासूसी नेटवर्क और सैन्य ठिकाना स्थापित करने की फिराक में है। कम्युनिस्ट विचारधारा की आड़ में क्यूबा के आर्थिक संकट का फायदा उठाकर चीन उसे अपने आर्थिक शिकंजे में कसना चाहता है ताकि वह अमेरिकी सीमाओं के बेहद करीब अपनी मजबूत रणनीतिक मौजूदगी दर्ज करा सके। यही वजह है कि जब भी अमेरिका और क्यूबा के बीच तनाव बढ़ता है, चीन तुरंत बयानबाजी शुरू कर खुद को क्यूबा का सबसे बड़ा संरक्षक दिखाने का नाटक रचता है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चीन की विश्वसनीयता पर उठे गंभीर सवाल और विशेषज्ञों की राय

चीन के इस दोहरे रवैये पर दुनिया भर के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों और थिंक टैंकों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विश्लेषकों का स्पष्ट कहना है कि चीन का यह दोहरा चरित्र पूरी तरह से बेनकाब हो चुका है। आप एक ही समय में एशिया में अपने पड़ोसियों की जमीनों और समुद्रों पर अवैध कब्जा करने वाले आक्रामक गुंडे नहीं हो सकते और साथ ही लैटिन अमेरिका में शांति व संप्रभुता के रक्षक बनने का नाटक नहीं कर सकते। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) की यह पुरानी आदत रही है कि वह अपनी घरेलू तानाशाही, तिब्बत व शिनजियांग में मानवाधिकारों के दमन और पड़ोसी देशों के प्रति अपनी आक्रामकता से दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ऊंची आवाज में बयानबाजी करती है।

वैश्विक कूटनीति में चीन के इस फर्जी रुख का क्या होगा भावी अंजाम

चीन की यह दोगली रणनीति अब वैश्विक पटल पर बेअसर साबित हो रही है। भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और आसियान (ASEAN) देश चीन के इस चालबाज रवैये को भली-भांति समझते हैं और यही वजह है कि क्वाड (QUAD) जैसे सुरक्षा गठबंधन मजबूत हो रहे हैं। क्यूबा जैसे देश भी धीरे-धीरे यह समझ रहे हैं कि चीन की कथित मदद के पीछे हमेशा कोई न कोई छुपा हुआ रणनीतिक शिकंजा होता है, जो अंततः देश की संप्रभुता को ही लील जाता है। ड्रैगन का यह दोहरा चरित्र और पड़ोसियों को बुली करके दूरदराज के देशों का हमदर्द बनने का दिखावा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के इतिहास में उसकी घटती साख का सबसे बड़ा कारण बन चुका है।