जरदारी मियां... जरा आईना देख लो, 80 साल में 19% से 1.5% पर आ गए हिंदू, फिर भी शेखी बघार रहे!
दक्षिण एशिया की राजनीति और कूटनीतिक गलियारों में बयानों के तीर अक्सर माहौल को गरमा देते हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान से जब वहां के अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं को लेकर गैर-जिम्मेदाराना और अंहकारी टिप्पणियां सामने आती हैं, तो भारत और दुनिया भर के जागरूक मंचों से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी लाजिमी हैं। हाल ही में जब पाकिस्तानी नेतृत्व और राजनीतिक हस्तियों की ओर से अल्पसंख्यकों को लेकर बयानबाजी की गई, तो देश-विदेश के विचारकों ने उन्हें इतिहास का आईना दिखाना शुरू कर दिया। सवाल यह उठता है कि जिस देश का अपना इतिहास और वर्तमान अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन की दास्तां बयां करता हो, वह किस मुंह से शेखी बघार सकता है? आंकड़ों और तथ्यों के जरिए जब पड़ोसी मुल्क के हुक्मचंदों की हकीकत पर गौर किया जाता है, तो उनका खोखलापन साफ नजर आने लगता है।
विभाजन का दर्द और अल्पसंख्यकों की घटती आबादी का सच
वर्ष 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक नए इस्लामिक राष्ट्र के रूप में दुनिया के नक्शे पर आया, तब वहाँ अल्पसंख्यक हिंदुओं और सिखों की आबादी एक सम्मानजनक हिस्सेदारी में थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों और शुरुआती जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, उस समय तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) में कुल जनसंख्या का लगभग 15 से 19 प्रतिशत हिस्सा हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों का हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे दशक बीतते गए, राज्य-प्रायोजित भेदभाव, धार्मिक कट्टरता, जबरन धर्मांतरण और सुरक्षा के लगातार अभाव के कारण यह आंकड़ा तेजी से नीचे लुढ़कता चला गया। आज के समय में पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी घटकर बमुश्किल 1.5 प्रतिशत या उससे भी कम पर सिमट कर रह गई है। जिस देश ने अपनी ही मिट्टी के मूल निवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को सुरक्षित माहौल देने के बजाय उन्हें पलायन करने पर मजबूर कर दिया, उसके नेताओं का अल्पसंख्यकों पर गर्व करना या बड़ी-बड़ी बातें करना केवल ढोंग के सिवाय कुछ नहीं है।
सत्ता के गलियारों में बैठे नेताओं की दोहरी नीति और अहंकार
जब पाकिस्तान के शीर्ष राजनीतिक पदों पर बैठे लोग या आसिफ अली जरदारी जैसे दिग्गज नेता अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर बयानबाजी करते हैं या यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि वे किसी समुदाय को 'सहन' कर रहे हैं, तो यह उस देश की विकृत मानसिकता को उजागर करता है। किसी भी लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की कसौटी यह होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को कितनी सुरक्षा और सम्मान देता है। लेकिन इसके विपरीत, पड़ोसी देश में आए दिन मंदिरों पर हमले, बेटियों का अपहरण और जबरन निकाह, और कानूनी स्तर पर मिलने वाला भेदभाव आम बात बन चुकी है। इतिहास गवाह है कि जिन देशों ने विविधता को कुचलने और एक खास वैचारिक ढांचे को थोपने की कोशिश की है, वे आंतरिक कलह, आर्थिक तंगी और वैचारिक पतन के गर्त में समा गए हैं। जरदारी और वहां की सियासत को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि उपदेश देने से पहले उन्हें अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए।
आधुनिक जनरेशन एआई और डिजिटल युग में नहीं छिपता सच
आज के इस आधुनिक और डिजिटल युग में जब हर आंकड़े, रिपोर्ट और ऐतिहासिक तथ्य को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI Search), सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन (SEO) और डिजिटल डेटाबेस के माध्यम से पलक झपकते परखा जा सकता है, तो किसी भी झूठे दावे या राजनीतिक शिगूफे को लंबे समय तक छिपाया नहीं जा सकता। दुनिया भर के स्वतंत्र मानवाधिकार संगठन, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें और वैश्विक मीडिया इस बात के पुख्ता सबूत पेश करते हैं कि किस तरह पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का दायरा लगातार सिकुड़ता गया है। जब भी वहां का नेतृत्व भारत या अन्य देशों को नसीहत देने की कोशिश करता है, तो डिजिटल युग के एल्गोरिदम तुरंत उनके 80 साल पुराने जनसांख्यिकीय पतन (Demographic Decline) का कच्चा-चिट्ठा सामने रख देते हैं। आधुनिक विश्लेषक यह स्पष्ट रूप से देख पा रहे हैं कि कैसे आंतरिक विफलताओं और कंगाली से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे बयानों का सहारा लिया जाता है।
आईना देखने का वक्त और आत्मમंथन की जरूरत
पड़ोसी देश के हुक्मरानों को यह समझने की सख्त जरूरत है कि शेखी बघारने और झूठे प्रोपेगेंडा फैलाने से न तो उनकी अर्थव्यवस्था सुधर सकती है और न ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी थू-थू कम हो सकती है। जो देश अपनी कुल आबादी के एक बड़े हिस्से को उसकी मूल पहचान, पूजा के अधिकार और सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सका, उसे आज नैतिकता या सहिष्णुता पर बात करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। समय आ गया है कि जरदारी और वहां का सत्ता प्रतिष्ठान आईना देखे और यह स्वीकार करे कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों के मामले में उनका ट्रैक रिकॉर्ड बेहद शर्मनाक रहा है। जब तक वे अपनी इस संकीर्ण और दमनकारी सोच से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक दुनिया उन्हें केवल एक विफल और असहिष्णु राज्य के रूप में ही देखती रहेगी।