Up kiran,Digital Desk : सुप्रीम कोर्ट में चल रही एक ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने जनहित याचिका (PIL) की पूरी व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं। सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने 9 जजों की संविधान पीठ के समक्ष दलील दी कि अब देश में PIL सिस्टम को पूरी तरह खत्म करने का समय आ गया है। इस पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए यह स्पष्ट किया कि अदालतें अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सतर्क हो चुकी हैं।
केंद्र सरकार की दलील: क्यों खत्म हो PIL?
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालती कार्यवाही के दौरान कई कड़े तर्क पेश किए:
दुरुपयोग का हथियार: सरकार का मानना है कि PIL अब जनहित के बजाय 'निजी एजेंडे' और 'प्रायोजित (Sponsored) राजनीति' का जरिया बन गई है।
बदली हुई परिस्थितियां: SG ने कहा कि 50 साल पहले जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब लोग अनपढ़ और गरीब थे। आज ई-फाइलिंग और विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA/DALSA) के कारण न्याय हर किसी की पहुंच में है।
तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं: जब पीड़ित खुद अदालत आ सकता है, तो किसी 'तीसरे पक्ष' को उसकी ओर से याचिका दायर करने की अनुमति क्यों दी जाए?
CJI सूर्यकांत का जवाब: "अब अदालतें बहुत चौकस हैं"
मुख्य न्यायाधीश ने सरकार की चिंताओं को समझा, लेकिन व्यवस्था को खत्म करने के बजाय 'सतर्कता' पर जोर दिया:
एजेंडे पर नजर: CJI ने कहा कि अदालतें अब बहुत सावधानी बरत रही हैं। वे किसी भी याचिका को स्वीकार करने से पहले यह देखती हैं कि कहीं इसके पीछे कोई छिपा हुआ एजेंडा तो नहीं है।
2006 बनाम 2026: चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि पिछले दो दशकों में स्थिति पूरी तरह बदल गई है। 2006 में जो याचिकाएं आसानी से स्वीकार हो जाती थीं, आज 2026 में उन्हें नोटिस जारी करने से पहले ही बारीकी से परखा जाता है।
सख्त छंटनी: उन्होंने उदाहरण दिया कि कोर्ट नंबर 1 में अब केवल उन्हीं PIL पर नोटिस जारी किए जाते हैं जिनमें वास्तविक दम होता है।
[Image Concept: An illustration of a gavel splitting a paper titled 'PIL' with a spotlight on the Scales of Justice]
विवाद की जड़: शबरीमला और धार्मिक हस्तक्षेप
यह पूरी बहस शबरीमला मंदिर मामले से उपजे एक रेफरेंस की सुनवाई के दौरान हुई। अदालत के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि:
"क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो उस धर्म या समूह का हिस्सा नहीं है, जनहित याचिका के जरिए किसी धर्म की सदियों पुरानी परंपरा को चुनौती दे सकता है?"
केंद्र सरकार का तर्क है कि वकीलों के संगठनों या एनजीओ को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि वे 'श्रद्धालु' (Devotees) नहीं होते।
9 जजों की महापीठ
इस महत्वपूर्ण विषय पर फैसला लेने वाली पीठ में शामिल हैं:
CJI सूर्यकांत (अध्यक्षता)
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची।
आगे क्या?
CJI की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट PIL सिस्टम को पूरी तरह खत्म करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन इसे 'फिल्टर' करने के नियमों को और अधिक सख्त बना सकता है। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि न्याय का दरवाजा गरीबों के लिए खुला रहे, लेकिन पेशेवर याचिकाकर्ताओं के लिए बंद हो जाए।
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