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Up kiran,Digital Desk : आम आदमी पार्टी (AAP) और कभी अरविंद केजरीवाल के 'राइट हैंड' माने जाने वाले राघव चड्ढा के बीच की दूरियां अब उस मोड़ पर आ गई हैं, जहां से वापसी नामुमकिन लग रही है। पिछले एक पखवाड़े में जो घटनाक्रम बदला है, वह साफ संकेत दे रहा है कि राघव चड्ढा अब पार्टी के भीतर 'अवांछित' हो चुके हैं। बुधवार को कुछ ही घंटों के भीतर हुए दो बड़े घटनाक्रमों ने इस कयास को और पुख्ता कर दिया है कि चड्ढा पर 'फाइनल एक्शन' की पटकथा लिखी जा चुकी है।

पहला संकेत: कुर्सी के बाद सुरक्षा पर चली 'कैंची'

राघव चड्ढा और 'आप' के रिश्तों में खटास की शुरुआत तभी हो गई थी जब केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान वह लंबे समय तक लंदन में रहे। हालांकि पार्टी ने तब 'आंखों के ऑपरेशन' का बचाव किया था, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली।

पद छीना: इसी महीने की शुरुआत में चड्ढा को राज्यसभा के डिप्टी लीडर पद से अचानक हटा दिया गया।

सुरक्षा हटाई: बुधवार को पंजाब सरकार (AAP) ने राघव चड्ढा को मिली Z+ सुरक्षा वापस ले ली। दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही पंजाब सरकार ने सुरक्षा हटाई, केंद्र सरकार (BJP) ने उन्हें Z कैटेगरी की सुरक्षा मुहैया करा दी। राजनीतिक गलियारों में इसे चड्ढा की बीजेपी से बढ़ती नजदीकी के तौर पर देखा जा रहा है।

दूसरा संकेत: ED की रेड के पीछे 'राघव' का हाथ!

आम आदमी पार्टी ने अब अपने ही सांसद पर सीधा और गंभीर हमला बोला है। चड्ढा की जगह राज्यसभा में डिप्टी लीडर बनाए गए अशोक कुमार मित्तल के ठिकानों पर हाल ही में ईडी (ED) की छापेमारी हुई। 'आप' के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने आरोप लगाया कि यह छापेमारी राघव चड्ढा के इशारे पर हुई है।

बीजेपी से मुलाकात का दावा: ढांडा ने कहा कि चड्ढा डिप्टी लीडर पद से हटाए जाने से नाराज थे और उन्होंने बीजेपी के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की।

षड्यंत्र का आरोप: पार्टी का कहना है कि अशोक मित्तल के घर रेड पड़ना और उसी वक्त चड्ढा को केंद्र से सुरक्षा मिलना कोई इत्तेफाक नहीं है। पार्टी अब चड्ढा और बीजेपी के बीच 'सांठगांठ' के सबूत पेश कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी में है।

आम आदमी पार्टी के सामने 'नुकसान' का गणित

इतनी कड़वाहट के बावजूद पार्टी राघव चड्ढा (और स्वाति मालीवाल) को बाहर निकालने का आदेश देने से हिचकिचा क्यों रही है? इसके पीछे एक तकनीकी और कानूनी कारण है:

राज्यसभा की सदस्यता: यदि पार्टी राघव चड्ढा को 'निष्कासित' (Expel) करती है, तो नियम के मुताबिक वह 'बिना पार्टी के सदस्य' (Unattached Member) बन जाएंगे, लेकिन उनकी सांसद की कुर्सी सलामत रहेगी।

बीजेपी को फायदा: निकाला गया सांसद सदन में पार्टी के व्हिप से आजाद हो सकता है या तकनीकी रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचा सकता है।

संख्याबल में कमी: 'आप' के पास राज्यसभा में सीमित सदस्य हैं। चड्ढा को निकालने का मतलब है सदन में अपनी ताकत को खुद कम करना। पार्टी चाहती है कि चड्ढा खुद इस्तीफा दें, ताकि वे उपचुनाव करा सकें, लेकिन चड्ढा ऐसा नहीं करेंगे।