Up kiran,Digital Desk: नई दिल्ली से मॉस्को की उड़ान में व्लादिमीर पुतिन शायद सोच रहे होंगे कि भारत दौरे की कामयाबी ने रूस को नई ताकत दी है। वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत करने की बातें हुईं। लेकिन घर पहुंचते ही एक काला बादल मंडरा रहा है। दुनिया की बड़ी लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाएं रूस के समुद्री तेल कारोबार पर अब तक का सबसे सख्त प्रहार करने को तैयार हैं। यह खबर रूस की युद्ध मशीन को सीधी चोट देगी क्योंकि तेल ही उसके बजट का बड़ा सहारा है। आइए देखें यह सब कैसे हो रहा है।
G7 देशों और यूरोपीय संघ की नई रणनीति रूस के कच्चे तेल के लिए समुद्री रास्तों पर पूरी तरह रोक लगाने की है। पश्चिमी जहाजों और बीमा सेवाओं को बंद कर देना इसका मुख्य लक्ष्य है। अभी ये सेवाएं रूस के तेल ढोने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। रॉयटर्स को छह विश्वसनीय स्रोतों ने यह बात बताई। अगर यह योजना लागू हुई तो रूस को अपनी पुरानी चालाकियों पर फिर सोचना पड़ेगा।
रूस ने यूक्रेन पर हमला करने के बाद तेल का खेल बदल दिया। 2022 से G7 ग्रुप यानी अमेरिका ब्रिटेन कनाडा फ्रांस जर्मनी इटली जापान और EU ने रूसी तेल खरीद पर पाबंदी तो लगाई लेकिन पूरी नहीं। उन्होंने प्राइस कैप का जाल बिछाया। इसमें तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से कम रखने पर पश्चिमी जहाज और बीमा मिलते रहे। रूस को थोड़ी परेशानी हुई लेकिन कारोबार रुका नहीं।
समय बीतते ही रूस ने जवाब दिया। मॉस्को ने शैडो फ्लीट नाम का छिपा बेड़ा तैयार किया। ये पुराने जहाज हैं जो ईरान वेनेजुएला की शैली में चलते हैं। बिना पश्चिमी नियमों के। अक्टूबर 2025 तक रूस का 44 प्रतिशत तेल इसी से एशिया भेजा गया। बाकी 38 प्रतिशत अभी भी G7 EU और ऑस्ट्रेलिया के टैंकरों पर निर्भर है। सितंबर में EU और कनाडा ने कैप को 47.6 डॉलर पर ला दिया लेकिन अमेरिका ने साथ नहीं दिया। ट्रंप सरकार इस पर शक रखती रही।
अब नई योजना प्राइस कैप को भूलकर पूर्ण समुद्री सेवाओं पर पाबंदी की है। रूसी तेल ले जाने वाले किसी भी जहाज को पश्चिमी टैंकर बीमा या रजिस्ट्रेशन नहीं मिलेगा। चाहे मंजिल कहीं भी हो। खास निशाना एशिया के बाजार जैसे भारत और चीन। रूस का एक तिहाई से ज्यादा तेल ग्रीस साइप्रस माल्टा जैसे EU देशों के जहाजों से जाता है। यह कदम रूस के मुनाफे को सीधा चुभेगा।
क्यों लगेगा रूस को इतना बुरा असर? क्योंकि यह पुरानी प्राइस कैप व्यवस्था को उखाड़ फेंकेगा। रूस अभी भी अपने तेल का बड़ा हिस्सा पश्चिमी सेवाओं से बेचता है। अगर G7-EU ने हरी झंडी दी तो रूस को शैडो फ्लीट पर दांव दोगुना करना पड़ेगा। वर्तमान में यह बेड़ा 1423 जहाजों का है जिनमें 921 पर पहले से पाबंदी है। रूस को या तो फ्लीट बढ़ानी होगी या निर्यात घटाना पड़ेगा।
EU के 27 सदस्य यह कदम अपनी 20वीं पाबंदी पैकेज में जोड़ना चाहते हैं। यह 2026 की शुरुआत में शुरू हो सकती है। लेकिन पहले G7 की एकजुटता जरूरी। ब्रिटेन और अमेरिका आगे बढ़ा रहे हैं। यूरोपीय आयोग G7 सहमति पर जोर दे रहा ताकि प्रस्ताव आसानी से पास हो। ब्रिटेन अमेरिका के अफसर तकनीकी बातें कर रहे हैं। अंतिम फैसला अमेरिकी नीति पर टिका है। खासकर ट्रंप प्रशासन की रूस यूक्रेन शांति वार्ता वाली रणनीति पर। चार स्रोत कहते हैं अमेरिका का रवैया अभी साफ नहीं। अगर लागू हुआ तो यह 2022 के हमले के बाद रूस के तेल पर सबसे तेज वार होगा।




