Up kiran,Digital Desk : खाड़ी देशों की राजनीति और वैश्विक तेल बाजार में एक अभूतपूर्व बदलाव आया है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 60 साल पुराने तेल संगठन 'ओपेक' से अलग होने का ऐलान कर दिया है। यह फैसला केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि गहरा कूटनीतिक है, जिसकी जड़ों में सऊदी अरब का दबदबा और पाकिस्तान की 'दोहरी चाल' छिपी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुस्लिम देशों के बीच बढ़ती उस दरार का परिणाम है, जो अब खुलकर सतह पर आ गई है।
1. सऊदी अरब का 'कोटा सिस्टम' और वर्चस्व की जंग
ओपेक (OPEC) में सऊदी अरब का दर्जा एक 'बड़े भाई' जैसा रहा है, जो अपनी सुविधा और बाजार की कीमतों के अनुसार सदस्य देशों का तेल उत्पादन कोटा तय करता है।
दबाव से मुक्ति: यूएई के पास अपनी क्षमता से अधिक तेल उत्पादन की शक्ति है, लेकिन ओपेक के नियमों के कारण उसे अपना उत्पादन सीमित रखना पड़ता था। यूरेशिया ग्रुप के फिरास मकसद के अनुसार, यूएई अब अपनी पूरी क्षमता से तेल निकालकर अपनी अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाना चाहता है।
सऊदी नियंत्रण का अंत: ओपेक से निकलने का मतलब है कि अब यूएई पर रियाद (सऊदी अरब) की तेल नीतियों का कोई नियंत्रण नहीं रहेगा। वह अपनी मर्जी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई बढ़ाकर मुनाफा कमा सकेगा।
2. पाकिस्तान का 'तटस्थ' रवैया और यूएई की नाराजगी
पाकिस्तान और यूएई के रिश्तों में आई कड़वाहट इस एग्जिट की एक बड़ी वजह बनी है।
ईरान-अमेरिका संघर्ष: जब ईरान ने यूएई के ठिकानों पर हमले किए, तब यूएई को पाकिस्तान से एक स्पष्ट स्टैंड की उम्मीद थी। लेकिन पाकिस्तान ने 'मध्यस्थ' बनने की कोशिश की और ईरान की निंदा करने से बचता रहा।
दगाबाजी का आरोप: यूएई के प्रतिनिधियों का मानना है कि पाकिस्तान एक ओर तो यूएई से आर्थिक मदद लेता है, लेकिन जब सुरक्षा की बात आती है, तो वह 'तटस्थता' का चोला ओढ़कर ईरान के करीब रहने की कोशिश करता है। यूएई ने इसे पाकिस्तान की 'मौकापरस्ती' करार दिया है।
3. सऊदी-पाकिस्तान 'डिफेंस नेक्सस' से असुरक्षा
यूएई की नाराजगी तब और बढ़ गई जब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक बड़ी डिफेंस डील हुई।
परमाणु सुरक्षा: सऊदी अरब ने पाकिस्तान (जो एकमात्र परमाणु संपन्न मुस्लिम देश है) के साथ नाटो (NATO) जैसा रक्षा समझौता किया है। इसमें पाकिस्तान ने सऊदी अरब की सुरक्षा की गारंटी ली है।
यूएई की चिंता: अबू धाबी को लगता है कि सऊदी और पाकिस्तान मिलकर एक नया गुट बना रहे हैं, जिससे क्षेत्र में यूएई का प्रभाव कम हो सकता है। ओपेक छोड़कर यूएई ने जता दिया है कि वह अपनी क्षेत्रीय रणनीति अब स्वतंत्र रूप से बनाएगा।
ओपेक से निकलने के बाद यूएई को क्या हासिल होगा?
59 वर्षों के लंबे जुड़ाव को तोड़ने के पीछे यूएई के तीन बड़े रणनीतिक लाभ हैं:
पूर्ण उत्पादन क्षमता: यूएई अपनी 30 लाख बैरल प्रतिदिन की क्षमता को बढ़ाकर 50 लाख बैरल तक ले जाना चाहता है, जो ओपेक में रहते हुए संभव नहीं था।
सॉवरेन निर्णय: वह वाशिंगटन, बीजिंग और मॉस्को के साथ अपने तेल सौदे सीधे और स्वतंत्र रूप से कर सकेगा।
आर्थिक डाइवर्सिफिकेशन: तेल से होने वाली अतिरिक्त कमाई का उपयोग यूएई अपने विजन 2030 के तहत पर्यटन और तकनीक क्षेत्र में निवेश करने के लिए करेगा।




