Up kiran,Digital Desk : खाड़ी देशों की राजनीति और वैश्विक तेल बाजार में एक ऐसा भूचाल आया है जिसने दशकों पुराने समीकरणों को मलबे में तब्दील कर दिया है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने दुनिया के सबसे ताकतवर तेल संगठन ओपेक (OPEC) से बाहर निकलने का ऐतिहासिक फैसला किया है। यह कदम केवल तेल की कीमतों से नहीं जुड़ा है, बल्कि इसके पीछे ईरान के हमले, पाकिस्तान का बदला हुआ रुख और सऊदी अरब के साथ छिड़ी 'वर्चस्व की जंग' जिम्मेदार है।
1. ईरान के हमले और पाकिस्तान की 'न्यूट्रल' चाल
इस पूरे विवाद की शुरुआत हालिया अमेरिका-ईरान संघर्ष से हुई। जब ईरान ने यूएई के तेल और बुनियादी ढांचों पर मिसाइलों और ड्रोनों की बरसात की, तब यूएई को अपने सबसे भरोसेमंद साथी पाकिस्तान से सैन्य मदद की उम्मीद थी।
हमले का स्तर: यूएई के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, उसने ईरान की 537 बैलिस्टिक मिसाइलों और 2,256 ड्रोनों को इंटरसेप्ट किया।
पाकिस्तान का रुख: यूएई चाहता था कि पाकिस्तान अपनी सेना और हथियारों के साथ ईरान के खिलाफ खड़ा हो। लेकिन पाकिस्तान ने 'तटस्थ' (Neutral) रहने का फैसला किया और मध्यस्थ की भूमिका चुनी।
नतीजा: युद्ध की मार झेल रहे यूएई को पाकिस्तान की यह 'शांति की भाषा' गद्दारी जैसी लगी। उसे लगा कि संकट के समय उसके पड़ोसियों और सहयोगियों ने उसे अकेला छोड़ दिया।
2. यूएई का 'आर्थिक परमाणु हमला' और सऊदी का दखल
पाकिस्तान के रवैये से नाराज होकर यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MBZ) ने एक सख्त आर्थिक कदम उठाया:
कर्ज की वसूली: यूएई ने पाकिस्तान को दिए 3.5 अरब डॉलर के कर्ज को तुरंत वापस मांग लिया, जिसे उसे 2027 तक नहीं मांगना था। यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए 'डेथ वारंट' जैसा था।
सऊदी की एंट्री: जब पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर था, तब सऊदी अरब ने बीच में आकर पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज दिया और उसे डूबने से बचा लिया।
रक्षा समझौता: सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक NATO-शैली का रक्षा समझौता हुआ। इसके तहत पाकिस्तान (परमाणु शक्ति) ने सऊदी की सुरक्षा की गारंटी ली। इससे यूएई को लगा कि सऊदी और पाकिस्तान मिलकर उसे क्षेत्र में अलग-थलग कर रहे हैं।
3. सऊदी अरब बनाम यूएई: पुराने दोस्त, नए दुश्मन
सऊदी अरब और यूएई के बीच का 'हनीमून पीरियड' अब खत्म हो चुका है। दोनों के बीच तनाव के तीन मुख्य केंद्र हैं:
यमन और सूडान: यमन में सऊदी हूतियों से समझौता चाहता है जबकि यूएई आक्रामक है। सूडान के गृहयुद्ध में भी दोनों देश अलग-अलग गुटों का समर्थन कर रहे हैं।
नेतृत्व की जंग: यूएई के क्राउन प्रिंस MBZ और सऊदी के क्राउन प्रिंस MBS (मोहम्मद बिन सलमान) के बीच अरब दुनिया का असली 'बॉस' बनने की होड़ मची है।
तेल का कोटा: ओपेक में सऊदी अरब अपनी मनमर्जी से तेल उत्पादन घटाता या बढ़ाता है। यूएई अपनी पूरी क्षमता (करीब 30 लाख बैरल प्रतिदिन) से तेल बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को और आधुनिक बनाना चाहता है, लेकिन ओपेक के नियम उसे रोक रहे थे।
4. ओपेक (OPEC) छोड़ने के बड़े मायने
59 साल पुराने इस गठबंधन को तोड़ने का मतलब है कि अब यूएई एक 'फ्री प्लेयर' बन गया है:
अपनी शर्तों पर तेल: यूएई अब किसी भी कोटे की परवाह किए बिना जितना चाहे उतना तेल निकाल और बेच सकता है। वह ओपेक की कुल सप्लाई का 9% हिस्सा संभालता है।
सॉवरेन फैसला: यूएई के उद्योग मंत्री सुल्तान अल जाबेर ने स्पष्ट किया कि यह राष्ट्रीय हित और ऊर्जा बाजार की स्थिरता के लिए लिया गया एक संप्रभु निर्णय है।




