Up kiran,Digital Desk : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि जिन आपराधिक मामलों की जड़ निजी विवाद में हो और जिनका समाधान आपसी समझौते से हो चुका हो, उन्हें आगे चलाना व्यर्थ है। ऐसे मामलों में न तो किसी ठोस नतीजे की संभावना रहती है और न ही इससे न्याय व्यवस्था को कोई लाभ मिलता है। उल्टा, अदालत का कीमती समय ही खर्च होता है।
इसी सोच के साथ कोर्ट ने जालसाजी, धोखाधड़ी और कूटरचना जैसे आरोपों में दर्ज एक प्राथमिकी को समझौते के आधार पर रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की खंडपीठ ने अवकाश और छह अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामला प्रयागराज के जॉर्जटाउन थाना क्षेत्र से जुड़ा था, जहां 2 जुलाई 2025 को अवकाश सहित सात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आरोप थे कि निजी लेनदेन से जुड़े एक विवाद में जालसाजी और धोखाधड़ी की गई। बाद में दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई और आपसी सहमति से विवाद सुलझा लिया गया। इसके बाद समझौता विलेख पर भी हस्ताक्षर किए गए।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब पक्षकार स्वयं विवाद समाप्त कर चुके हों, तो ऐसे मामलों में आरोपियों के दोषी साबित होने की संभावना बहुत कम रह जाती है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह न्याय के हित में और अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर सकता है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिन आपराधिक मामलों की प्रकृति मूल रूप से वित्तीय, वाणिज्यिक या साझेदारी से जुड़ी हो और जिनमें नागरिक विवाद प्रमुख हो, उन्हें समझौते के आधार पर खत्म किया जाना व्यवहारिक और न्यायसंगत है। आज जब अदालतें पहले से ही मामलों के बोझ से जूझ रही हैं, तब ऐसे मुकदमों को आगे बढ़ाना उचित नहीं है जिनका अंतिम परिणाम लगभग शून्य हो।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने जॉर्जटाउन थाने में दर्ज प्राथमिकी और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।




