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Up kiran,Digital Desk : ईरान और अमेरिका के बीच स्थायी युद्धविराम पर सहमति न बन पाने के कारण पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में तनाव गहरा गया है। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखने की आशंका है। दिग्गज रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो भारत की जीडीपी (GDP) वृद्धि दर धीमी हो सकती है और व्यापार घाटा (Trade Deficit) एक चिंताजनक स्तर तक पहुंच सकता है।

चालू खाता घाटा (CAD) पर दबाव: GDP के 2% तक पहुंचने का अनुमान

क्रिसिल के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरकों (Fertilizers) की कीमतों में वैश्विक स्तर पर भारी उछाल आने की आशंका है।

आयात बिल में वृद्धि: कच्चे तेल की कीमतों में सालाना आधार पर 23 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे भारत का पेट्रोलियम आयात बिल बेतहाशा बढ़ जाएगा।

व्यापार घाटा: आयात महंगा होने और वैश्विक मांग में नरमी के कारण निर्यात घटने से देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़कर जीडीपी के 2 फीसदी तक पहुंच सकता है।

निर्यात पर तीन तरफा मार

भारतीय निर्यातकों के लिए यह संकट कई चुनौतियां लेकर आया है:

शिपिंग और बीमा लागत: लाल सागर और पश्चिम एशिया के समुद्री मार्ग असुरक्षित होने के कारण माल भेजने की लागत (Freight Cost) और बीमा प्रीमियम (Insurance) काफी बढ़ गया है।

वैश्विक मांग में कमी: युद्ध जैसी स्थितियों के कारण वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता है, जिससे भारतीय सामानों की मांग कम हो सकती है।

निर्यात में गिरावट: फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) ने भी चिंता जताई है कि वर्ष 2025-26 में भारत का वस्तु निर्यात 2-3% तक घट सकता है।

महंगाई और रुपये पर असर

क्रिसिल की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि ऊर्जा (तेल और गैस) की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ेगा। परिवहन और लॉजिस्टिक्स महंगा होने से जरूरी चीजों के दाम बढ़ सकते हैं। इसके अलावा, विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव और चौड़े होते व्यापार घाटे के कारण भारतीय रुपया (INR) भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकता है।

जीडीपी वृद्धि दर में कटौती की आशंका

मूडीज और अन्य रेटिंग एजेंसियों की तरह क्रिसिल ने भी संकेत दिया है कि यदि ऊर्जा संकट गहराया, तो भारत की विकास दर के अनुमान में 1 फीसदी तक की कटौती संभव है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आयात करता है, ऐसे में आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) में कोई भी बाधा देश की औद्योगिक गतिविधियों और आर्थिक गति पर ब्रेक लगा सकती है।