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UP Kiran,Digital Desk: महाशिवरात्रि के इस पवित्र अवसर पर हम आपको सिरोही जिले के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जो न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मंदिर भैंससिंह गांव के पास स्थित है, जो आबूरोड उपखंड में आता है। इस मंदिर की पुनर्खोज 50 साल पहले हुई थी और तब से यह श्रद्धालुओं के बीच एक खास पहचान बना चुका है।

खुदाई से सामने आया ऐतिहासिक मंदिर

आबूरोड-पालनपुर फोरलेन से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर 1975 में एक ऐतिहासिक खुदाई के दौरान उजागर हुआ था। यह मंदिर पहले मिट्टी के टीले में दबा हुआ था, लेकिन संत मंगलदास महाराज के स्वप्न में यह संकेत मिलने के बाद स्थानीय ग्रामीणों की मदद से खुदाई का कार्य शुरू किया गया। इस खुदाई के दौरान मंदिर, प्राचीन बावड़ी और मूर्तियों का पता चला, जो इस स्थान की ऐतिहासिकता को और भी प्रगाढ़ करते हैं। इसके बाद 1985 में महंत ओंकारदास महाराज की देखरेख में इस मंदिर का पुनर्निर्माण कार्य किया गया और उसे उसका मौजूदा स्वरूप दिया गया।

अद्भुत बावड़ी: कभी न सूखा पानी

मंदिर के परिसर में स्थित प्राचीन बावड़ी ने हमेशा से श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया है। यह बावड़ी न केवल अपनी ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इस क्षेत्र में कभी भी पानी का संकट नहीं आया। यहां का जलस्तर स्थिर रहता है, चाहे मौसम के कोई भी हालात हों। बावड़ी तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया गया है और सुरक्षा के लिहाज से इसे लोहे की जालियों से घेर लिया गया है।

धार्मिक गतिविधियाँ और श्रद्धालुओं की भीड़

मंदिर परिसर में कई अन्य छोटे मंदिर भी हैं जो खुदाई में मिले थे। इसके अलावा, यहां एक गौशाला भी संचालित हो रही है। समीपवर्ती पहाड़ी पर भगवान सूर्य की एक प्राचीन प्रतिमा और 11,111 शिवलिंगों की श्रृंखला भी स्थापित की गई है। महाशिवरात्रि और श्रावण मास में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी जाती है, जब पूरा वातावरण एक धार्मिक मेले में बदल जाता है।

इतिहास में गहराई: परमार काल से जुड़ी धरोहर

यह मंदिर चंद्रावती नगरी से जुड़ा हुआ है, जो 11वीं और 12वीं शताब्दी में परमार राजाओं की राजधानी थी। इस शहर में शैव, वैष्णव और जैन धर्म के मंदिरों के अलावा भव्य राजमहल भी बने थे। 1303 ईस्वी में परमारों के शासन के बाद यहां देवड़ा और चौहानों का राज स्थापित हुआ। सिरोही राज्य की स्थापना के बाद यह स्थल देवड़ा चौहानों की राजधानी बना। चंद्रावती नगर पर कई बार हमले हुए और इस कारण अनेक मंदिरों को क्षति पहुंची, जिनके अवशेष आज भी इस स्थान पर देखे जा सकते हैं। 1822 में कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी किताब "Annals and Antiquities of Rajasthan" में इस मंदिर और इसके आसपास के स्थापत्य के बारे में विस्तृत जानकारी दी थी।