UP Kiran,Digital Desk: पंजाब में आगामी 2027 के विधानसभा इलेक्शनों को लेकर सियासी गतिविधियाँ तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) जहां अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं भाजपा ने भी राज्य में अपनी स्थिति सुधारने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। लेकिन भाजपा के लिए यह राह आसान नहीं लगती। इस बीच, दोनों पार्टियों के बीच पुराने गठबंधन को फिर से जोड़ने की कोशिशें जारी हैं, खासकर शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ।
अकाली-भा.ज.पा. गठबंधन: एक बार फिर सुगबुगाहट
आकिल दल और भाजपा का गठबंधन 2020 में कृषि कानूनों के विरोध के कारण टूट गया था, और तब से दोनों दलों के बीच राजनीतिक दरार बनी रही। हालांकि, पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में गठबंधन की चर्चा जरूर हुई थी, लेकिन अंततः कोई समझौता नहीं बन सका। हाल ही में फिरोजपुर में पंजाब के गवर्नर गुलाब चंद कटारिया द्वारा आयोजित नशामुक्ति पदयात्रा ने इस गठबंधन की दिशा में एक नई उम्मीद को जन्म दिया। इस यात्रा में दोनों दलों के प्रमुख नेता—भा.ज.पा. के कार्यकारी प्रधान अश्वनी शर्मा और अकाली दल के प्रमुख सुखबीर बादल—साथ दिखाई दिए, जो राजनीतिक हलकों में इस गठबंधन के फिर से बनने की चर्चाओं को हवा दे रहे हैं।
गठबंधन के सूत्रधार: डेरा ब्यास के बाबा
डेरा ब्यास के प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लो ने इस यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यात्रा के दौरान डेरा मुखी, पंजाब के गवर्नर और भाजपा नेताओं के बीच एक बैठक हुई, जो पंजाब की राजनीति में हड़कंप मचाने का कारण बनी। बाद में, अकाली दल के नेता बिक्रम मजीठिया भी डेरा मुखी से मिलने ब्यास पहुंचे। मजीठिया, जो कि लंबे समय से गठबंधन के पक्षधर हैं, ने यहां से एक नई राजनीतिक दिशा की ओर इशारा किया। खास बात यह है कि मजीठिया को हाल ही में जमानत मिली, और बाबा गुरिंदर ने मजीठिया पर लगाए गए आरोपों को गलत ठहराया।
भा.ज.पा. का आंतरिक संघर्ष और फैसला
अकाली दल 2027 के चुनाव से पहले भाजपा से गठबंधन के लिए इच्छुक है, क्योंकि अतीत में दोनों दलों का गठबंधन राज्य में सरकार बनाने में सफल रहा था। हालांकि, भाजपा के अंदर ही इस गठबंधन को लेकर मतभेद हैं। एक समूह इसे जरूरी मानता है, जबकि दूसरा इसे नकारता है। भाजपा हाईकमान फिलहाल पंजाब में अपनी राजनीतिक स्थिति का आकलन कर रही है, ताकि इस गठबंधन के फायदे और नुकसान का सही मूल्यांकन किया जा सके। हालांकि, अब जबकि भाजपा और अकाली दल के बीच सियासी कड़वाहट काफी हद तक कम हो गई है, लगता है कि दोनों दलों के बीच एक समझौता हो सकता है।




