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Up Kiran, Digital Desk: भारत के लोकतंत्र में एक सवाल हमेशा से बहस का केंद्र रहा है - आखिरी फैसला सुनाने का अधिकार किसके पास होना चाहिए? क्या वो संसद, जिसे देश की जनता चुनकर भेजती है, या फिर सुप्रीम कोर्ट, जो संविधान का रक्षक है? यह पुरानी लड़ाई एक बार फिर सुर्खियों में है, क्योंकि राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से इसी जटिल मुद्दे पर राय मांगी है (जिसे 'प्रेसिडेंशियल रेफरेंस' कहा जाता है)।

तो आखिर ये पूरा मामला है क्या?

इसे आसान भाषा में समझते हैं। हमारे लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ हैं - संसद (Legislature) और न्यायपालिका (Judiciary)।

लड़ाई की जड़ क्या है:असली टकराव तब होता है, जब सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून (खासकर किसी संवैधानिक संशोधन) को रद्द कर देता है। संसद को लगता है कि यह जनता के फैसले का अपमान है, जबकि कोर्ट को लगता है कि वह संविधान को बचाने की अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण कुछ साल पहले देखने को मिला था जब संसद ने जजों की नियुक्ति के लिए 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' (NJAC) कानून बनाया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे यह कहते हुए रद्द कर दिया कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के खिलाफ है, जो कि संविधान का 'मूल ढांचा' है।

अब नया क्या हो रहा है?

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से जो राय मांगी है, वह इसी शक्ति संतुलन के सवाल को फिर से कुरेदती है। क्या संसद कोई ऐसा कानून बना सकती है जो सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले को पलट दे? सुप्रीम कोर्ट की इस पर जो भी राय होगी, वह भारत में संसद और न्यायपालिका के बीच के रिश्ते की भविष्य की दिशा तय करेगी।

लेकिन सवाल वही है - लोकतंत्र में अंतिम शक्ति किसके हाथ में होनी चाहिए: जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथ में या संविधान की रक्षा करने वाले न्यायाधीशों के हाथ में? यह बहस सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा एक गहरा सवाल है।

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