Up Kiran, Digital Desk: हमारे समाज में संत, महात्मा और धार्मिक गुरु बड़ी श्रद्धा और सम्मान के पात्र होते हैं। अक्सर इन संतों की बातों से लोग मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं, जिनका जीवन सरल और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रेरणादायक होता है। संत प्रेमानंद जी महाराज, जो अपनी सरलता और दिव्य ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं, हाल ही में अपने सत्संग में एक गंभीर चेतावनी दे रहे थे। उन्होंने बताया कि जीवन में एक ऐसी गलती है, जिसे करने से ना सिर्फ पुण्य नष्ट होता है, बल्कि इसका प्रभाव हमारी आत्मा पर भी बुरा पड़ सकता है।
किसे नहीं करनी चाहिए निंदा?
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, किसी संत या भगवान के भक्त की निंदा करना सबसे बड़ा अपराध है। इसे वे "वैष्णव अपराध" या "संत अपमान" के नाम से जानते हैं। उनका मानना है कि भगवान स्वयं अपने अपमान को एक बार माफ कर सकते हैं, लेकिन यदि किसी सच्चे संत या भक्त का अपमान किया जाए, तो उसका परिणाम बहुत ही नकारात्मक होता है। महाराज जी बताते हैं कि जब हम किसी संत या भक्त की निंदा करते हैं, तो हमारे जीवन में संचित पुण्य समाप्त हो जाते हैं।
संतों की निंदा के भयानक परिणाम
यह जो निंदा की प्रक्रिया होती है, वह कभी-कभी बिना किसी इरादे के भी हो सकती है। अक्सर हम मित्रों के साथ बातचीत करते समय या सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के बारे में आलोचना करने लगते हैं। यदि वह व्यक्ति एक संत या भक्त है, तो हमारी यह आलोचना हमारे पुण्य को नष्ट कर देती है। शास्त्रों में कहा गया है कि भक्त भगवान का हृदय होते हैं, और हृदय को चोट पहुंचाना शरीर को कष्ट देने के समान है। इसलिए ऐसी गलतियां इसी जन्म में सजा का कारण बनती हैं।
क्यों नहीं मिलती माफी?
महाराज जी का कहना है कि जब हम भगवान से कोई अपराध करते हैं तो हम संतों की शरण में जाकर क्षमा प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यदि हम किसी संत या भगवान के भक्त की निंदा करते हैं, तो इसे ठीक करना बहुत कठिन हो जाता है। अगर अनजाने में ऐसी गलती हो जाए, तो हमें तुरंत उस व्यक्ति से क्षमा मांगनी चाहिए, चाहे वह मानसिक रूप से हो या प्रत्यक्ष रूप से। इसके अलावा, अपनी वाणी को भगवान के नाम से जोड़कर सकारात्मक शब्दों का ही प्रयोग करना चाहिए।
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