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Up kiran,Digital Desk : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 का बिगुल बजते ही सबकी नजरें भवानीपुर सीट पर टिक गई हैं। यह महज एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि सत्ता की प्रतिष्ठा का सवाल बन चुकी है। इस सियासी रणभूमि में 2 अप्रैल को एक बड़ा धमाका होने जा रहा है, जब भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। खास बात यह है कि सुवेंदु के इस शक्ति प्रदर्शन में खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मौजूद रहेंगे, जो ममता बनर्जी के गढ़ में भाजपा की हुंकार को और धार देंगे।

8 अप्रैल को 'दीदी' का पैदल मार्च और नामांकन

भाजपा की चुनौती को स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने भी अपनी रणनीति तैयार कर ली है। सुवेंदु के नामांकन के ठीक छह दिन बाद, यानी 8 अप्रैल को 'दीदी' अपने चिर-परिचित अंदाज में नामांकन दाखिल करेंगी। ममता बनर्जी अपने कालीघाट स्थित आवास से पैदल ही पर्चा भरने निकलेंगी। उनके साथ तृणमूल कांग्रेस (TMC) का पूरा शीर्ष नेतृत्व मौजूद रहेगा। यह रोड शो न केवल एक नामांकन प्रक्रिया होगी, बल्कि विपक्ष को अपनी ताकत दिखाने का जरिया भी बनेगा।

नंदीग्राम का 'पार्ट-2': क्या इतिहास दोहराएगा खुद को?

भवानीपुर की यह जंग 2021 के नंदीग्राम चुनाव की यादें ताजा कर रही है। पिछले चुनाव में सुवेंदु ने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को कांटे की टक्कर में मात दी थी। हालांकि, बाद में भवानीपुर उपचुनाव जीतकर ममता ने अपनी कुर्सी बचाई थी। इस बार पासा पलट चुका है; पिछली बार ममता, सुवेंदु के इलाके में गई थीं, लेकिन इस बार सुवेंदु अधिकारी 'दीदी' के सबसे मजबूत किले भवानीपुर में उन्हें चुनौती देने पहुंचे हैं। इसे नंदीग्राम के बदले के तौर पर देखा जा रहा है।

वोटर लिस्ट का 'एक्स-फैक्टर' बिगाड़ सकता है खेल

इस बार भवानीपुर का चुनावी गणित काफी उलझा हुआ है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मतदाता सूची में हुए संशोधनों ने दोनों दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं:

नाम कटे: करीब 47,000 मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं।

जांच के घेरे में: लगभग 14,000 नाम अभी भी प्रशासन की जांच के दायरे में हैं।

समीकरण: दिलचस्प बात यह है कि 2021 के उपचुनाव में ममता की जीत का अंतर 58,000 वोटों का था। यानी जितने वोट कटे या जांच के घेरे में हैं, वह जीत के अंतर के लगभग बराबर हैं।

टीएमसी का आरोप है कि जांच के घेरे में आए 14,000 नामों में से 56 फीसदी अल्पसंख्यक समुदाय के हैं, जो उनका कोर वोट बैंक माना जाता है। ऐसे में भवानीपुर की डगर इस बार 'दीदी' के लिए इतनी आसान नहीं दिख रही, जितनी पहले हुआ करती थी।