Up kiran,Digital Desk : पश्चिम एशिया में तनाव अब उस मोड़ पर पहुंच गया है जहां से वापसी का रास्ता बेहद कठिन नजर आ रहा है। अमेरिका द्वारा ईरानी बंदरगाहों की पूर्ण नाकेबंदी (Blockade) के एलान के बाद तेहरान ने अब तक का सबसे खौफनाक पलटवार किया है। ईरानी सैन्य कमांडरों ने दो टूक कहा है कि अगर ईरान के आर्थिक हितों का गला घोंटा गया, तो फारस की खाड़ी से लेकर ओमान सागर तक किसी भी देश का बंदरगाह सुरक्षित नहीं बचेगा।
समुद्री डकैती बनाम संप्रभुता: आर-पार की जंग
अमेरिका ने सोमवार से ईरान के सभी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों को रोकने के लिए अपनी नौसेना को तैनात करने की घोषणा की है। इस पर भड़के ईरान ने इसे 'अंतरराष्ट्रीय समुद्री डकैती' करार दिया है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के आला अधिकारियों ने चेतावनी दी कि "समुद्री सुरक्षा या तो सबके लिए होगी, या किसी के लिए नहीं।" ईरान के इस बयान का सीधा मतलब है कि वह खाड़ी क्षेत्र के अन्य तेल निर्यातक देशों के बंदरगाहों को भी निशाना बना सकता है।
बातचीत की मेज से युद्ध के मुहाने तक
यह तनाव उस समय चरम पर पहुंचा है जब पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गई। अमेरिका चाहता था कि ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों और क्षेत्रीय दखल को पूरी तरह बंद करे, जबकि ईरान ने इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमलों के हर्जाने और अपनी फ्रीज की गई संपत्तियों को रिहा करने की शर्त रखी थी। बातचीत की विफलता ने कूटनीति के दरवाजे बंद कर दिए और अब सारा दारोमदार सैन्य ताकत पर टिक गया है।
अमेरिकी नाकेबंदी का खाका: क्या होगा असर?
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, यह नाकेबंदी बेहद सख्त होगी:
टारगेट: केवल वे जहाज जो ईरानी बंदरगाहों में प्रवेश करेंगे या वहां से माल लेकर बाहर निकलेंगे।
रियायत: गैर-ईरानी बंदरगाहों (जैसे सऊदी अरब, यूएई या कुवैत) के बीच आवाजाही करने वाले जहाजों को होर्मुज से गुजरने दिया जाएगा।
उद्देश्य: ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले तेल निर्यात को पूरी तरह ठप करना।
भारत की कूटनीति पर टिकी नजरें
इस भीषण तनाव के बीच भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा था कि भारत इस संकट को सुलझाने के लिए लगातार संवाद कर रहा है। चूंकि भारत का बड़ा व्यापारिक हित और ऊर्जा सुरक्षा इस क्षेत्र से जुड़ी है, इसलिए नई दिल्ली पूरी स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है।
22 अप्रैल के बाद क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में लागू संघर्षविराम 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। यदि तब तक कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो दुनिया को एक बड़े सैन्य टकराव का सामना करना पड़ सकता है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह दबाव में झुकने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुनने को तैयार है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप होने और कच्चे तेल की कीमतों में आग लगने का खतरा पैदा हो गया है।




