Up Kiran, Digital Desk: जब दो देश आपस में लड़ रहे हों, पड़ोसी परेशान हों और दुनिया में तनाव बढ़ रहा हो, तो ऐसे माहौल में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को कैसे दूर रख सकते हैं? पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच चल रहे खूनी संघर्ष के बीच अब डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा है कि वह दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने और इस लड़ाई को सुलझाने के लिए तैयार हैं.
व्हाइट हाउस में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जब उनसे इस बढ़ते तनाव के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कहा, "मुझे युद्धों को सुलझाना पसंद है (I love solving wars)."
ट्रंप ने क्यों दिया यह बयान: पिछले कई दिनों से पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर हालात बेहद खराब हैं. दोनों देशों की सेनाओं के बीच हिंसक झड़पें और हवाई हमले हो रहे हैं, जिनमें दर्जनों सैनिक और आम नागरिक मारे जा चुके हैं. पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंकियों को पनाह दे रही है जो पाकिस्तान में हमले करते हैं. इसी के जवाब में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के अंदर काबुल समेत कई इलाकों में एयरस्ट्राइक भी की हैं.
दोनों देशों के रिश्ते इतने खराब हो चुके हैं कि अब वे एक दूसरे से बात करने को भी तैयार नहीं हैं. ऐसे में ट्रंप को लगता है कि यह उनके लिए एक बड़ा मौका है. उन्होंने कहा, "मैंने हमेशा युद्धों को रोका है, उन्हें शुरू नहीं किया. अगर दोनों देश चाहें तो मैं इस मामले को सुलझा सकता हूं. हम देखेंगे कि क्या होता है, लेकिन किसी को तो इस लड़ाई को रोकना ही होगा."
क्या तालिबान और पाकिस्तान मानेंगे ट्रंप की बात?
यह सबसे बड़ा सवाल है. ट्रंप भले ही शांतिदूत बनने की पेशकश कर रहे हों, लेकिन यह इतना आसान नहीं है.
अफगानिस्तान का तालिबान शासन: तालिबान सरकार ने हमेशा से किसी भी बाहरी हस्तक्षेप का विरोध किया है. वे ट्रंप की बात क्यों मानेंगे, यह कहना मुश्किल है.
पाकिस्तान का रुख: पाकिस्तान भी इस मामले में किसी तीसरे देश, खासकर अमेरिका, की दखलअंदाजी पसंद नहीं करेगा. पाकिस्तान का कहना है कि यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है और वह इससे खुद निपटेगा.
हालांकि, ट्रंप के इस बयान ने दुनिया का ध्यान एक बार फिर इस गंभीर मुद्दे की ओर खींचा है. पहले भी कतर और सऊदी अरब जैसे देशों की मध्यस्थता से कुछ समय के लिए संघर्ष विराम हुआ था, लेकिन वह ज्यादा देर तक टिक नहीं पाया. अब देखना यह होगा कि क्या ट्रंप की यह पेशकश सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाती है, या वाकई दोनों देश उनकी मदद लेने पर विचार करते हैं.

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