प्रशांत किशोर के 7वें वेतन आयोग के दांव से उलझी एनडीए की सियासी गणित

प्रशांत किशोर के 7वें वेतन आयोग के दांव से उलझी एनडीए की सियासी गणित

भारतीय राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने बिहार की राजनीति में एक ऐसा बड़ा और धारदार सियासी चक्रव्यूह रच दिया है, जिससे सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। पारंपरिक तौर पर जाति, धर्म और कम्युनिटी के इर्द-गिर्द घूमने वाली बिहार की सियासत को अब एक नए आर्थिक और कार्य-आधारित एजेंडे पर लाने की कोशिश की जा रही है। प्रशांत किशोर द्वारा लगातार उठाए जा रहे प्रशासनिक सुधारों, शिक्षकों के मान-सम्मान और 7वें वेतन आयोग (7th Pay Commission) से जुड़े मुद्दों ने राज्य के एक बड़े और सबसे प्रभावशाली वर्ग का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर की यह रणनीति केवल सतही बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सुविचारित मास्टरप्लान का हिस्सा है, जिसके आगे एनडीए के पुराने और आजमाए हुए समीकरण कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं।

क्या है जन सुराज का 'फिक्स वोटर' प्लान? 25 लाख मतदाताओं के इस बड़े वर्ग को साधने की रणनीति

प्रशांत किशोर की राजनीतिक कार्यशैली का मुख्य आधार 'फिक्स वोटर' (Fixed Voter) तैयार करना है। इस रणनीति के तहत उन मतदाताओं को टारगेट किया जा रहा है जो मुद्दों के आधार पर मतदान करते हैं और किसी के बहकावे में नहीं आते। बिहार में मौजूदा समय में लगभग चार से पांच लाख शिक्षक विभिन्न सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थानों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यदि इन शिक्षकों के परिवार के सदस्यों और आश्रितों को भी जोड़ लिया जाए, तो यह कुल मतदाता संख्या सीधे तौर पर करीब 25 लाख तक पहुंच जाती है। जन सुराज पार्टी इन 25 लाख मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए 7वें वेतन आयोग के लाभ और उनके अधिकारों को मुख्य मुद्दा बना रही है। इसके अलावा, राज्य के अन्य विभागों के करीब 16 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारियों का बड़ा धड़ा भी इस नीति से प्रभावित हो रहा है। यदि यह पूरा का पूरा वर्ग एकमुश्त किसी एक राजनीतिक विकल्प के साथ खड़ा हो जाता है, तो यह बिहार के सभी पुराने चुनावी समीकरणों और जातीय गणित को पूरी तरह से तहस-नहस कर सकता है।

एनडीए के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका, सत्तारूढ़ दल के पास फिलहाल इस काट का अभाव

लंबी अवधि से भारतीय जनता पार्टी और जेडीयू नीਤ एनडीए गठबंधन के साथ एक बड़ा वर्ग अनुशासित वोटर के रूप में जुड़ा रहा है। लेकिन पिछले कुछ समय से प्रशासनिक नीतियों, नियोजित और संविदा शिक्षकों के मुद्दों तथा आर्थिक सुरक्षा को लेकर कर्मचारियों के एक वर्ग में असंतोष पनप रहा था। प्रशांत किशोर इसी खामोश असंतोष को एक मजबूत राजनीतिक आंदोलन में बदलने का काम कर रहे हैं। सत्ताधारी गठबंधन के रणनीतिकार अभी तक इस बात का कोई प्रभावी काट नहीं ढूंढ पाए हैं कि इस व्यापक आर्थिक और वेतन संबंधी वादे का मुकाबला कैसे किया जाए। जन सुराज की ओर से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि जनता अब केवल खोखले वादों या प्रलोभनों के झांसे में आने वाली नहीं है, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य, शिक्षा और पारदर्शी शासन प्रणाली के आधार पर वोट करेगी।

आगामी चुनावों और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर पड़ेगा दूरगामी असर, बदल रही है बिहार की तासीर

बांकीपुर उपचुनाव में शानदार जीत हासिल करने के बाद से ही प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी पूरे आक्रामक तेवर में नजर आ रही है। विधान परिषद (MLC) चुनावों और आगामी विधानसभा के बड़े राजनीतिक रण से पहले शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों को साधने का यह दांव एनडीए के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि सत्ता में बैठे दल समय रहते इन कर्मचारियों और शिक्षकों के हितों को साधने के लिए कोई ठोस नीति नहीं लेकर आते हैं, तो यह 'चक्रव्यूह' आने वाले दिनों में सत्तारूढ़ गठबंधन की चुनावी संभावनाओं को गहरा आघात पहुंचा सकता है। बहरहाल, प्रशांत किशोर के इस 'फिक्स वोटर' प्लान ने बिहार के राजनीतिक पटल पर हलचल मचा दी है और आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि एनडीए इस चुनौती से किस प्रकार निपटता है।