NDA से अलग राह तलाशने की कोशिश में क्यों दिख रहे हैं चिराग पासवान
भारतीय राजनीति के गलियारों और राष्ट्रीय जनता दल-एनडीए गठबंधन के भीतर इस वक्त एक ऐसी बड़ी सियासी चर्चा जोर पकड़ रही है, जिसने राजनीतिक पंडितों और विश्लेषकों के कान खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे मुखर और भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाने वाले, केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान के हालिया बयानों और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि क्या 'पीएम मोदी के हनुमान' कहे जाने वाले चिराग पासवान का मन एनडीए गठबंधन से थोड़ा डोल रहा है या फिर वे आगामी रणनीतिक समीकरणों के तहत अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन मजबूत करने की जुगत में लगे हैं। जिस तरह से चिराग पासवान ने कई मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखे हैं और बिहार से लेकर दिल्ली तक अपनी अलग पहचान को धार दी है, उसने राजनीतिक हलकों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बिहार की सियासत में कोई नया भूचाल आने वाला है।
आखिर क्यों उठ रहे हैं चिराग पासवान के बगावत या अलग राह पकड़ने के राजनीतिक कयास और क्या हैं इसके मायने?
चिराग पासवान के तेवरों को लेकर इन कयासों के पीछे कई ठोस कारण और हालिया राजनीतिक घटनाएं जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ महीनों के दौरान बिहार के स्थानीय राजनीतिक घटनाक्रमों, सीटों के बंटवारे की सुगबुगाहट और राज्य सरकार के कई प्रशासनिक फैसलों पर चिराग पासवान की पार्टी द्वारा जिस बेबाकी से अपनी राय रखी गई है, उसे लेकर यह माना जा रहा है कि वे एनडीए के भीतर अपनी सौदेबाजी की क्षमता को बढ़ाना चाहते हैं। इसके अलावा, हाल के दिनों में उनके कुछ ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपनी पार्टी के जनाधार को पूरे देश में फैलाने और हर राज्य में अपने दम पर संगठन मजबूत करने का संकल्प दोहराया है। विपक्षी दलों का मानना है कि चिराग पासवान अंदरखाने अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को नए सिरे से साध रहे हैं, हालांकि एलजेपी (राम विलास) के वरिष्ठ नेताओं ने इन सभी अटकलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि वे पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनडीए के साथ चट्टान की तरह खड़े हैं और उनके गठबंधन पर कोई आंच नहीं आने वाली है।
बिहार की सियासत का बदलता समीकरण और क्षेत्रीय दलों की अपनी महत्वाकांक्षाएं, एनडीए के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
बिहार एक ऐसा राज्य है जहां की राजनीति हमेशा से जातिगत समीकरणों, क्षेत्रीय क्षत्रपों और पल-पल बदलते गठबंधनों के लिए जानी जाती है। आगामी राजनीतिक भविष्य और विधानसभा या अन्य चुनावों के मद्देनजर हर दल अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटा हुआ है। चिराग पासवान अपने पिता और दिवंगत कद्दावर नेता राम विलास पासवान की राजनीतिक विरासत को बहुत ही सधी हुई चालों के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता और दलित मतदाताओं के बीच उनकी मजबूत पकड़ के कारण हर बड़ा राजनीतिक दल उन्हें अपने पाले में बनाए रखना चाहता है। यही वजह है कि जब भी चिराग पासवान थोड़ा भी आक्रामक रुख अपनाते हैं या अपनी पार्टी के हितों को सबसे ऊपर रखते हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो जाता है। वे अपनी पार्टी को केवल एक क्षेत्रीय दल तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं।
क्या बीजेपी और चिराग पासवान के बीच सब कुछ ठीक है? अंदरखाने की खबरों पर टिकी हैं देश भर की निगाहें
भले ही आधिकारिक तौर पर एनडीए के शीर्ष नेतृत्व और चिराग पासवान के बीच सब कुछ सामान्य होने का दावा किया जा रहा हो, लेकिन पर्दे के पीछे की राजनीति हमेशा इतनी सीधी नहीं होती। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चिराग पासवान एक दूरदर्शी राजनेता की तरह अपनी पार्टी के दीर्घकालिक हितों को साध रहे हैं ताकि आने वाले समय में उन्हें किसी भी परिस्थिति में मोलभाव करने की बेहतर स्थिति मिल सके। पीएम मोदी के प्रति उनकी निष्ठा जगजाहिर है, लेकिन राजनीति में संभावनाएं हमेशा खुली रहती हैं। आने वाले दिनों में बिहार के राजनीतिक पटल पर चिराग पासवान का अगला कदम क्या होगा, यह इस बात को तय करेगा कि राज्य की आबोहवा किस करवट बैठती है। फिलहाल, इन चर्चाओं ने दिल्ली से लेकर पटना तक सियासी तापमान को काफी बढ़ा दिया है और हर किसी की नजरें उनके हर एक राजनीतिक कदम पर टिकी हुई हैं कि वे भविष्य में अपनी राजनीति को किस दिशा में ले जाते हैं।