UNSC में सुधार की देरी पर गरजे विदेश मंत्री एस जयशंकर

UNSC में सुधार की देरी पर गरजे विदेश मंत्री एस जयशंकर

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की निष्पक्ष, बुलंद और सख्त आवाज बन चुके विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर (S. Jaishankar) ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सालों से लंबित पड़े सुधारों को लेकर एक बार फिर पश्चिमी महाशक्तियों और वैश्विक संस्थाओं को कड़े शब्दों में घेरा है। अफ्रीका और विकासशील देशों (Global South) की मजबूत वकालत करते हुए विदेश मंत्री ने स्पष्ट संदेश दिया है कि आज के बहुध्रुवीय वैश्विक परिदृश्य में भारत और अफ्रीकी महाद्वीप को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व न देना बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। वैश्विक कूटनीति के केंद्र में गूंजते इस बयान में जयशंकर ने कहा कि जब तक 1.4 अरब से अधिक आबादी वाले भारत और 54 देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले विशाल अफ्रीकी महाद्वीप को विश्व की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था की मुख्य मेज पर उचित स्थान नहीं मिलता, तब तक संयुक्त राष्ट्र का ढांचा न केवल अधूरा है, बल्कि यह समय के साथ अपनी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता भी पूरी तरह खोता जा रहा है।

पुराना 'मैनेजमेंट बोर्ड' अब नहीं चलेगा: जयशंकर ने UN की कार्यप्रणाली पर दागे तीखे और सनसनीखेज सवाल

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वैश्विक सम्मेलनों और दौरों के दौरान संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा संरचना की तुलना एक पुरानी हो चुकी कंपनी के मैनेजमेंट से की, जो बदलते वक्त के हिसाब से खुद को बदलने में नाकाम रही है। उन्होंने कहा कि जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी, तब इसके सदस्यों की संख्या केवल 51 थी, जबकि आज यह बढ़कर लगभग चार गुना यानी 193 सदस्य देशों तक पहुंच चुकी है। जयशंकर ने कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि किसी संस्था का आकार चार गुना बढ़ जाए लेकिन उसका 'बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट' वही 80 साल पुराना रहे, तो वह कभी भी प्रभावी ढंग से काम नहीं कर सकता। गाजा, यूक्रेन संकट से लेकर अफ्रीका के कई क्षेत्रीय तनावों तक, आज दुनिया में उत्पन्न किसी भी बड़े वैश्विक संकट को सुलझाने में वीटो पावर से लैस सुरक्षा परिषद पूरी तरह से 'ग्रिडलॉक' (ठप) साबित हुई है। ऐसे में बिना व्यावहारिक सुधारों के इस संस्था का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।

कुछ मुट्ठी भर देश अफ्रीका के नाम पर बना रहे बहाना, जयशंकर ने वैश्विक शक्तियों के ढोंग से उठाया पर्दा

अपने आक्रामक भाषण के दौरान विदेश मंत्री ने उन चुनिंदा विकसित देशों के दोहरे रवैये की पोल खोलकर रख दी जो यूएनएससी सुधारों की राह में लगातार अड़ंगे डालते आ रहे हैं। उन्होंने बिना किसी का नाम लिए पर्दाफाश किया कि कुछ देश अफ्रीका के हितों का बहाना बनाकर सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि अफ्रीकी महाद्वीप ने 'इज़ुलविनी सर्वसम्मति' (Ezulwini Consensus) और 'सिरते घोषणापत्र' के जरिए वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति और मांगों को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है। अफ्रीका खुद सुरक्षा परिषद में अपनी वीटो पावर के साथ दो स्थायी सीटों की मांग कर रहा है। जयशंकर ने जोर देकर कहा कि भारत हमेशा से अफ्रीकी देशों की इन जायज मांगों का पूर्ण समर्थन करता आया है और उन्हें नजरअंदाज कर कोई भी नया वैश्विक ढांचा तैयार नहीं किया जा सकता।

ग्लोबल साउथ का नया अगुआ बना भारत: बहुध्रुवीय दुनिया में सुधार ही एकमात्र रास्ता

विदेश मंत्री का यह कड़ा रुख यह साबित करता है कि भारत अब वैश्विक फैसलों में केवल मूकदर्शक बनने के मूड में बिल्कुल नहीं है, बल्कि वह 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और गरीब देशों) के हकों की लड़ाई को पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ा रहा है। भारत जी4 (G4 - भारत, ब्राजील, जापान, जर्मनी) और एल.69 (L.69 Group) जैसे शक्तिशाली समूहों के साथ मिलकर सुरक्षा परिषद का विस्तार करने और संयुक्त राष्ट्र चार्टर में जरूरी बदलाव लाने के लिए चौतरफा कूटनीतिक दबाव बना रहा है। दुनिया भर के अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि भारत को स्थायी सीट न देना अब संयुक्त राष्ट्र की अपनी वैधता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। यदि संयुक्त राष्ट्र ने अपने इस वीटो-संचालित और पुराने ढर्रे को जल्द नहीं बदला, तो बहुपक्षवाद (Multilateralism) का यह वैश्विक मंच पूरी तरह से अप्रसंगिक होकर रह जाएगा, जिसकी सीधी जिम्मेदारी वीटो शक्तियों की हठधर्मिता पर होगी।