महाकुंभ से पहले गया जाने से पहले पुनपुन घाट पर क्यों किया जाता है पहला पिंडदान

महाकुंभ से पहले गया जाने से पहले पुनपुन घाट पर क्यों किया जाता है पहला पिंडदान

सनातन संस्कृति में पितृपक्ष का महीना और पिंडदान का अनुष्ठान हमारे पूर्वजों के प्रति अटूट श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है। हर साल भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इस पवित्र पखवाड़े में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पितरों की आत्मा की शांति और उनकी मुक्ति के लिए बिहार की पवित्र भूमि पर पहुंचते हैं। जब भी पितृ पक्ष मेले की बात होती है, तो सबसे पहला नाम गया जी का आता है, जिसे मोक्ष धाम कहा जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गया के विष्णुपद मंदिर में मुख्य पिंडदान करने से पहले एक बेहद जरूरी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है, जो पुनपुन नदी के तट पर पूरी होती है। पुनपुन घाट को हमारे प्राचीन शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं में मोक्ष का प्रथम द्वार कहा गया है, जहां पितृ तर्पण की शुरुआत करना अनिवार्य माना गया है।

क्या है पुनपुन घाट का पौराणिक महत्व और क्यों कहते हैं इसे मोक्ष का प्रथम द्वार

बिहार की राजधानी पटना से कुछ ही दूरी पर स्थित पुनपुन नदी का धार्मिक इतिहास पौराणिक काल से जुड़ा हुआ है। हिंदू धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, जब कोई भी श्रद्धालु अपने पितरों के मोक्ष की कामना लेकर गया धाम की यात्रा पर निकलता है, तो उसकी यात्रा का वास्तविक शुभारंभ पुनपुन नदी के तट से ही होता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान श्रीराम ने भी अपने त्रेता युग में माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पितृ पक्ष के दौरान अपने पिता राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए सबसे पहले पुनपुन नदी के तट पर ही पिंडदान किया था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि गया जी पहुंचने से पहले जो व्यक्ति पुनपुन घाट पर आकर अपने पूर्वजों का तर्पण और पिंडदान करता है, उसके पितरों को प्रेत योनि या कष्टों से मुक्ति का पहला मार्ग मिल जाता है। इसी मान्यता के चलते पुनपुन घाट को गया जी का प्रवेश द्वार और मोक्ष का प्रथम द्वार कहा जाता है।

पितृ पक्ष मेला 2026 में पुनपुन घाट की तैयारियां और उमड़ने लगी श्रद्धालुओं की भीड़

साल 2026 के पितृ पक्ष मेले के दौरान पुनपुन घाट पर देश के कोने-कोने से आने वाले तीर्थयात्रियों का तांता लगना शुरू हो गया है। जिला प्रशासन और स्थानीय समितियों द्वारा इस बार श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किए गए हैं ताकि किसी को भी किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। घाट की विशेष साफ-सफाई, सुरक्षा के कड़े प्रबंध, रोशनी की व्यवस्था, चेंजिंग रूम और नौका विहार की सुरक्षा जैसी तमाम बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त किया गया है। मान्यता है कि इस पवित्र जल में स्नान करने और विधि-विधान से पिंडदान करने से पितृ अत्यंत तृप्त होते हैं और अपने वंशजों को सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले तीर्थयात्री सुबह तड़के से ही मंत्रोच्चार और कर्मकांड के साथ अपने पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए पिंडदान करते नजर आ रहे हैं, जिससे पूरा इलाका पूरी तरह से भक्तिमय हो गया है।

पिंडदान की विधि और गया जाने से पहले पुनपुन में तर्पण का विशेष नियम

धार्मिक अनुष्ठानों के जानकारों और पुरोहितों के अनुसार, पुनपुन घाट पर पिंडदान करने की एक निश्चित और पवित्र प्रक्रिया होती है। सबसे पहले श्रद्धालु पुनपुन नदी के पवित्र जल में स्नान करते हैं या आचमन कर खुद को शुद्ध करते हैं। इसके बाद नदी के तट पर बैठकर अपने गोत्र, पूर्वजों के नाम और उनकी आत्मा की शांति का संकल्प लेते हुए पंडितों की उपस्थिति में पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन या दान की प्रक्रिया पूरी की जाती है। ऐसा माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति सीधे गया जी चला जाता है और पुनपुन में पिंडदान की इस परंपरा को छोड़ देता है, तो उसकी गया यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। यही वजह है कि गया के तीर्थ पुरोहित भी अपने यजमानों को सबसे पहले पुनपुन घाट जाने की सलाह देते हैं। यह परंपरा हमारी प्राचीन संस्कृति, अनुशासन और पूर्वजों के प्रति हमारी अटूट आस्था का एक जीवंत उदाहरण पेश करती है।