महंगा पेट्रोल, सस्ता क्रूड... फिर भी इस दिग्गज सरकारी तेल कंपनी को हुआ 4000 करोड़ का भारी नुकसान! जानिए इनसाइड स्टोरी

महंगा पेट्रोल, सस्ता क्रूड... फिर भी इस दिग्गज सरकारी तेल कंपनी को हुआ 4000 करोड़ का भारी नुकसान! जानिए इनसाइड स्टोरी

भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर और कमोडिटी मार्केट से इस समय की सबसे बड़ी कॉरपोरेट खबर सामने आ रही है। शेयर बाजार में लिस्टेड और देश की दूसरी सबसे बड़ी सरकारी तेल रिफाइनरी कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) ने चालू वित्त वर्ष (FY2026-27) की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के नतीजे घोषित कर दिए हैं। इन नतीजों ने सबको चौंका दिया है। कंपनी को इस तिमाही में 3,962.13 करोड़ रुपये का भारी कंसोलिडेटेड नेट लॉस (शुद्ध घाटा) हुआ है। पिछले 15 तिमाहियों (लगभग पौने चार साल) में यह पहला मौका है जब बीपीसीएल को घाटा उठाना पड़ा है।

आम जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल (Crude Oil) बीच में काफी सस्ता भी हुआ, घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम ऊंचे बने हुए हैं और सरकार ने भी टैक्स में राहत दी, तो फिर कंपनी का खजाना खाली कैसे हो गया? इस पहेली के पीछे छिपे हैं तीन सबसे बड़े तकनीकी और आर्थिक कारण।

1. वेस्ट एशिया संकट और 'प्राइस फ्रीज' की दोहरी मार

इस भारी नुकसान की सबसे मुख्य वजह है वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) और घरेलू बाजार में कीमतों का फ्रीज होना। मार्च और अप्रैल के दौरान अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़े पश्चिम एशिया संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से उछल गई थीं। लेकिन भारत में आम जनता को महंगाई से बचाने के लिए सरकार के निर्देश पर BPCL, IOCL और HPCL जैसी सरकारी कंपनियों ने करीब ढाई महीने तक पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों (Retail Prices) को नहीं बढ़ाया।

लागत (Input Cost) बहुत ज्यादा थी और बिक्री बेहद कम दाम पर हो रही थी। मई के आखिरी हफ्तों में पेट्रोल-डीजल के दाम में ₹7.50 प्रति लीटर से ज्यादा की बढ़ोतरी की गई, लेकिन तब तक कंपनियों को तगड़ी चपत लग चुकी थी।

2. मार्केटिंग मार्जिन में ऐतिहासिक गिरावट (नेगेटिव मार्जिन)

एक तेल कंपनी दो तरह से काम करती है- पहला 'रिफाइनिंग' (कच्चे तेल से पेट्रोल बनाना) और दूसरा 'मार्केटिंग' (उसे पेट्रोल पंपों पर बेचना)। पहली तिमाही में बीपीसीएल का रिफाइनिंग मार्जिन तो अच्छा रहा, लेकिन मार्केटिंग मार्जिन पूरी तरह तबाह हो गया।

जेफरीज (Jefferies) जैसी दिग्गज ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म की रिपोर्ट के मुताबिक, इस तिमाही के दौरान तेल कंपनियों को पेट्रोल बेचने पर औसतन ₹10.6 प्रति लीटर और डीजल बेचने पर ₹18.4 प्रति लीटर का 'नेगेटिव मार्जिन' (घाटा) उठाना पड़ रहा था। यानी तेल कंपनियां जितने पैसे में पेट्रोल-डीजल खरीद या बना रही थीं, रिटेल पंपों पर उससे कहीं कम दाम में बेच रही थीं।

3. एलपीजी (LPG) पर ₹3,485 करोड़ की अंडर-रिकवरी

पेट्रोल-डीजल के अलावा घरेलू रसोई गैस (LPG Cylinder) ने भी बीपीसीएल की बैलेंस शीट को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। चालू तिमाही के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एलपीजी की लागत बढ़ने के बावजूद घरेलू सिलेंडरों के दाम में केवल ₹89 की मामूली बढ़ोतरी की गई थी। इसके चलते बीपीसीएल को अकेले एलपीजी सेगमेंट में ₹3,485.22 करोड़ की भारी अंडर-रिकवरी (लागत से कम पर बेचने से हुआ नुकसान) झेलनी पड़ी।

रेवेन्यू 23% बढ़ा, लेकिन मुनाफा ले डूबा घाटा

दिलचस्प बात यह है कि देश में ईंधन की भारी मांग के कारण बीपीसीएल का कुल ऑपरेशनल रेवेन्यू (Revenue from Operations) सालाना आधार पर 23% बढ़कर 1,59,479 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। यानी कंपनी की बिक्री और टर्नओवर में कोई कमी नहीं थी, लेकिन लागत और बिक्री मूल्य के बीच का जो अंतर था, उसने 23% की इस बंपर कमाई को भी भारी नुकसान में बदल दिया। शेयर बाजार के जानकारों का मानना है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पूरी तरह स्थिर नहीं हो जातीं या घरेलू तेल कंपनियों को बाजार के हिसाब से रोज कीमतें तय करने की पूरी छूट नहीं मिलती, तब तक डाउनस्ट्रीम तेल कंपनियों के मुनाफे पर यह दबाव बना रहेगा।

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