दो बार फेल, 16 साल में तीसरी कोशिश: रिजर्व बैंक क्यों लाना चाहता है प्लास्टिक के नोट? जानिए कागजी मुद्रा से अंतर और इसके नफा-नुकसान

दो बार फेल, 16 साल में तीसरी कोशिश: रिजर्व बैंक क्यों लाना चाहता है प्लास्टिक के नोट? जानिए कागजी मुद्रा से अंतर और इसके नफा-नुकसान

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर देश में प्लास्टिक यानी पॉलीमर (Polymer) के नोट लाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हाल ही में जारी ग्लोबल टेंडर के अनुसार, शुरुआती चरण में देश के चुनिंदा शहरों में 10 रुपये और 20 रुपये के नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा सकता है। अगर यह ट्रायल सफल रहा, तो आने वाले समय में इसे देश भर में बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है।

आइए जानते हैं कि पिछले डेढ़ दशक से अटकी इस योजना के पीछे की पूरी कहानी क्या है, यह कागजी नोटों से कितने अलग हैं और इससे देश को क्या फायदे व नुकसान हो सकते हैं।

पहले क्यों असफल हुई थी यह योजना? (16 साल का इतिहास)

भारत में प्लास्टिक के नोट लाने की यह कोई पहली कोशिश नहीं है, बल्कि इससे पहले दो बार यह योजना तकनीकी और व्यावहारिक कारणों से ठंडे बस्ते में जा चुकी है:

  • पहली कोशिश (2009-2014): साल 2009 में सबसे पहले तत्कालीन सरकार ने संसद में प्लास्टिक नोट लाने की घोषणा की थी। इसके बाद फरवरी 2014 में पायलट प्रोजेक्ट के तहत देश के पांच अलग-अलग जलवायु वाले शहरों (कोच्चि, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर) में 10 रुपये के 1 अरब प्लास्टिक नोट उतारने का फैसला लिया गया था।

  • रुकावट क्यों आई?: उस समय की तकनीक से जुड़ी कुछ बाधाओं, एटीएम मशीनों द्वारा इन नोटों को ठीक से रीड न कर पाने और भारत की उष्णकटिबंधीय (Tropical) जलवायु परिस्थितियों में इनके रखरखाव की दिक्कतों के कारण इस प्रोजेक्ट को रोक दिया गया था।

अब लगभग 16 साल के लंबे अंतराल और तकनीकीिक रूप से अधिक उन्नत पॉलीमर सब्सट्रेट के उपलब्ध होने के बाद, आरबीआई ने ग्लोबल टेंडर जारी कर एक बार फिर ठोस कदम उठाया है।

रिजर्व बैंक प्लास्टिक नोटों के पीछे क्यों पड़ा है?

आरबीआई के इस कदम के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें हैं:

  1. छपाई और रिप्लेसमेंट का भारी खर्च: कपास के कागज (Cotton Paper) से बनने वाले मौजूदा नोट बहुत जल्दी गंदे और फटे जाते हैं, जिन्हें रिजर्व बैंक को बार-बार नष्ट कर नए छापने पड़ते हैं। छपाई पर आने वाला यह खर्च हर साल अरबों रुपये तक पहुंच जाता है।

  2. नोटों का छोटा जीवनचक्र (Life Span): खासकर 10, 20 और 50 रुपये जैसे छोटे मूल्य के नोट रोजाना के लेन-देन में सबसे ज्यादा हाथों से गुजरते हैं, जिससे वे बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं। पॉलीमर नोटों की उम्र पारंपरिक नोटों से कई गुना ज्यादा होती है।

कागजी नोटों से कितने अलग होते हैं प्लास्टिक नोट?

विशेषता पारंपरिक कागजी नोट (Paper Notes) प्लास्टिक/पॉलिमर नोट (Polymer Notes)
मटेरियल कॉटन और कपास के रेशे से बना विशेष कागज एक बेहद पतली, लचीली और विशेष पॉलीमर फिल्म
टिकाऊपन (Durability) जल्दी मुड़ जाते हैं, नमी से गल जाते हैं और आसानी से फट जाते हैं पानी में भीगने पर भी खराब नहीं होते और आसानी से नहीं फटते
सफाई और सेहत इन पर धूल, गंदगी और बैक्टीरिया आसानी से जम जाते हैं ये वॉटरप्रूफ और डस्ट-प्रूफ होते हैं, जिन्हें साफ रखना आसान है
सिक्युरिटी फीचर्स इनमें सुरक्षा के मानक होते हैं, लेकिन नकली नोटों का खतरा रहता है इसमें पारदर्शी खिड़की (See-through window) जैसे आधुनिक फीचर्स आसानी से जोड़े जाते हैं, जिससे नकल करना बेहद कठिन होता है

इस बदलाव के नफा और नुकसान (Pros & Cons)

फायदे (नफा):

  • लंबी उम्र: प्लास्टिक नोट कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक समय तक चलते हैं, जिससे बार-बार नोट छापने के खर्च में भारी कमी आएगी।

  • नकली नोटों पर लगाम: पॉलीमर सब्सट्रेट पर छपने वाले इन नोटों में ऐसे हाई-टेक सिक्योरिटी फीचर्स होते हैं जिनकी हूबहू नकल करना जालसाजों के लिए लगभग असंभव होता है।

  • मौसम का असर बेअसर: बारिश में भीगने या पसीने लगने से कागजी नोट गल जाते हैं, जबकि प्लास्टिक नोटों पर पानी या नमी का कोई असर नहीं पड़ता।

चुनौतियां (नुकसान):

  • शुरुआती लागत: पारंपरिक कागज के मुकाबले विशेष पॉलीमर शीट और तकनीक का आयात या निर्माण करना शुरू में महंगा पड़ सकता है।

  • मशीनों और एटीएम में अपग्रेडेशन: देश के सभी एटीएम, कैश सोर्टिंग और काउंटिंग मशीनों को इन नए प्लास्टिक नोटों के अनुकूल ढालने के लिए तकनीकी बदलाव करने होंगे।

  • मुड़ने की समस्या: शुरुआती दौर में ये नोट थोड़े कड़क होते हैं और इन्हें आपस में संभालकर रखना या पॉकेट में सेट करना थोड़ा अलग अनुभव हो सकता है।

आरबीआई स्पष्ट कर चुका है कि यदि यह पायलट प्रोजेक्ट सफल होता भी है, तो पुराने कागजी नोट रातों-रात बंद नहीं किए जाएंगे। दोनों तरह की मुद्राएं एक लंबे समय तक एक साथ सर्कुलेशन में बनी रहेंगी। दुनिया के करीब 60 से अधिक देश (जैसे ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर) पहले ही पॉलीमर नोट अपना चुके हैं और अब भारत भी इस तकनीक की ओर कदम बढ़ा रहा है।

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