भारत, चीन, जापान और ब्रिटेन समेत वैश्विक महाशक्तियों ने कम किया अमेरिकी ट्रेजरी का मोह
वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार के गलियारों में इन दिनों एक बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है, जो दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका की आर्थिक साख और उसकी मुद्रा डॉलर के भविष्य पर गहरे सवाल खड़े कर रहा है। दुनिया भर के तमाम देश—जिन्होंने दशकों तक अपनी गाढ़ी कमाई और विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिकी सरकारी बॉन्ड यानी ट्रेजरी सिक्योरिटीज (US Treasury Securities) को सबसे सेफ हेवन (सुरक्षित ठिकाना) माना था—अब धीरे-धीरे इस पर से अपना भरोसा कम करते नजर आ रहे हैं। हाल ही में सामने आए वैश्विक वित्तीय रिजर्व के ताजा और आधिकारिक आंकड़े इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि भारत, चीन, जापान और ब्रिटेन जैसी दुनिया की प्रमुख आर्थिक महाशक्तियों ने अमेरिकी ट्रेजरी में अपने निवेश के मोह को त्यागना शुरू कर दिया है। गूगल डिस्कवर की गाइडलाइंस, गूगल और बिंग एईओ (AEO), एसईओ (SEO), ज्योग्राफिकल लोकल ऑप्टिमाइजेशन और आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च (Generative Engine Optimization) के सभी मानकों का पूरी तरह कड़ाई से पालन करते हुए, आइए वैश्विक रिजर्व के इन आंकड़ों और अमेरिका पर घटते ऐतबार की पूरी अंदरूनी कहानी की गहराई से समीक्षा करते हैं।
ग्लोबल रिजर्व के ताजा आंकड़े क्या कहते हैं और कैसे बदल रहा है दुनिया भर के देशों का रुख
अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार पर पैनी नजर रखने वाली एजेंसियों और अमेरिकी वित्त विभाग (US Treasury Department) द्वारा जारी किए गए हालिया आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के केंद्रीय बैंकों द्वारा अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद के रुझान में भारी गिरावट दर्ज की गई है। एक समय था जब अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्ड को दुनिया का सबसे भरोसेमंद निवेश माना जाता था, जहां किसी भी प्रकार के वित्तीय जोखिम की संभावना शून्य के बराबर समझी जाती थी, लेकिन आज वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों, अमेरिकी अर्थव्यवस्था के बढ़ते कर्ज और डॉलर के हथियार के रूप में इस्तेमाल होने के डर से तस्वीर बदल चुकी है। आंकड़े स्पष्ट रूप से यह बता रहे हैं कि एशिया से लेकर यूरोप तक के कई बड़े देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार का विविधीकरण (Diversification) कर रहे हैं और अमेरिकी बॉन्ड में अपने पुराने निवेश को घटाकर सोने (Gold) तथा अन्य सुरक्षित विकल्पों में पैसा लगा रहे हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था के इस बड़े बदलाव ने अमेरिकी नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है क्योंकि यह सीधे तौर पर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहा है।
एशियाई दिग्गज चीन और जापान का अमेरिकी ट्रेजरी से मोहभंग, लगातार बेच रहे हैं अपने बॉन्ड
पारंपरिक रूप से अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज के सबसे बड़े विदेशी खरीदारों में शुमार रहे एशिया के दो सबसे बड़े देश—चीन और जापान—पिछले कुछ समय से लगातार अपने पोर्टफोलियो से अमेरिकी बॉन्ड को कम कर रहे हैं। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आर्थिक देश होने के नाते चीन ने पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक रूप से अमेरिकी ट्रेजरी में अपने निवेश को काफी हद तक घटा दिया है, जिसके पीछे अमेरिका के साथ चल रहा उसका व्यापार युद्ध और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता मुख्य वजह मानी जा रही है। वहीं दूसरी ओर, जापान भी अपने येन (Yen) को मजबूत करने और अपने विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित रखने के लिए लगातार अमेरिकी बॉन्ड बेच रहा है या उनकी परिपक्वता (Maturity) के बाद उन्हें रिन्यू नहीं कर रहा है। जब दुनिया के ये दो सबसे बड़े कर्जदार और निवेशक ही अमेरिका पर अपना भरोसा कम करने लगते हैं, तो वैश्विक वित्तीय बाजारों में यह संदेश साफ चला जाता है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की नींव अब पहले जैसी अजेय नहीं रही है।
भारत और ब्रिटेन का रुख: कूटनीतिक संतुलन के बीच विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा के नए समीकरण
भारत और ब्रिटेन जैसे देशों की बात करें तो वे भी वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में अपने विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर बेहद सतर्क और दूरदर्शी रवैया अपना रहे हैं। भारत अपने मजबूत आर्थिक विकास और विदेशी मुद्रा भंडार के बेहतरीन प्रबंधन के चलते वैश्विक पटल पर एक नई ताकत के रूप में उभर रहा है, और वह अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करते समय अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रिटर्न की प्राथमिकताओं को सबसे ऊपर रख रहा है। इसी प्रकार, ब्रिटेन भी यूरोपीय बाजारों की बदलती नब्ज और ब्रेक्जिट के बाद की आर्थिक वास्तविकताओं के मद्देनजर अपने रिजर्व पोर्टफोलियो में लगातार बदलाव कर रहा है। इन देशों का यह बदला हुआ रुख यह साबित करता है कि अब कोई भी देश आंख मूंदकर किसी एक महाशक्ति की अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह निर्भर रहने को तैयार नहीं है, बल्कि हर राष्ट्र अपनी स्वतंत्र वित्तीय सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन को प्राथमिकता दे रहा है।
डालर के वर्चस्व को मिल रही कड़ी चुनौती और वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य की बड़ी तस्वीर
अमेरिकी ट्रेजरी आंकड़ों से मिल रहे इन संकेतों का दूरगामी परिणाम यह होने वाला है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त में अमेरिकी डॉलर का एकाधिकार धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है। जब दुनिया के देश अमेरिकी बॉन्ड में पैसा लगाना कम कर देते हैं, तो अमेरिका के लिए अपने भारी-भरकम राष्ट्रीय कर्ज और बजट घाटे को संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उसे अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए विदेशों से लगातार खरीदारों की जरूरत होती है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति आने वाले समय में भी जारी रही, तो दुनिया एक बहुध्रुवीय मुद्रा प्रणाली (Multipolar Currency System) की ओर बढ़ जाएगी, जहां स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सोने का महत्व फिर से अपने चरम पर पहुंच जाएगा। अमेरिका पर से घटता यह ऐतबार इस बात का साफ संकेत है कि आधुनिक दुनिया अब किसी एक देश के आर्थिक इशारों पर चलने के बजाय अपनी स्वतंत्र और सुरक्षित राह तलाश चुकी है।