हर महीने पीरियड्स से पहले क्यों बढ़ जाती है एंग्जायटी और तनाव

हर महीने पीरियड्स से पहले क्यों बढ़ जाती है एंग्जायटी और तनाव

महिलाओं के शरीर में हर महीने होने वाले मासिक धर्म यानी पीरियड्स के चक्र से जुड़े शारीरिक बदलावों के बारे में तो हर कोई जानता है, लेकिन इसके मानसिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा अब जाकर शुरू हुई है। दुनिया भर में लाखों महिलाएं हर महीने अपने पीरियड्स शुरू होने से कुछ दिन पहले अचानक से अत्यधिक चिंता, घबराहट, मूड स्विंग्स और गंभीर एंग्जायटी का शिकार हो जाती हैं। चिकित्सा विज्ञान और मनोचिकित्सकों के अनुसार, यह कोई आम बात नहीं है बल्कि इसके पीछे हॉर्मोनल असंतुलन और शरीर के भीतर होने वाले रासायनिक बदलाव मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं। हालांकि, जब यह समस्या सामान्य मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं से आगे निकल जाती है, तो इसका सीधा कनेक्शन मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर स्थिति यानी बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar Disorder) से भी जुड़ जाता है। बहुत सी महिलाओं को यह समझ नहीं आता कि उनके मिजाज में अचानक होने वाले ये उतार-चढ़ाव सिर्फ हॉर्मोनल हैं या फिर इसके पीछे कोई छिपा हुआ मानसिक विकार काम कर रहा है। आज के इस आधुनिक युग में महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता तेजी से बढ़ रही है, और यह बेहद आवश्यक है कि पीरियड्स से पहले होने वाली इस मानसिक बेचैनी और बाइपोलर डिसऑर्डर के बीच के इस बारीक रिश्ते को गहराई से समझा जाए ताकि समय रहते सही इलाज और देखभाल मिल सके।

पीरियड्स से पहले महिलाओं में अचानक क्यों बढ़ जाती है एंग्जायटी और क्या हैं इसके मुख्य हॉर्मोनल कारण

मासिक धर्म चक्र के दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन (Estrogen) और प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) जैसे मुख्य हॉर्मोन के स्तर में तेजी से उतार-चढ़ाव होता रहता है। ओव्यूलेशन के बाद और पीरियड्स शुरू होने से ठीक पहले यानी ल्यूटियल फेज (Luteal Phase) के दौरान जब इन हॉर्मोन्स का स्तर अचानक नीचे गिरने लगता है, तो इसका सीधा असर मस्तिष्क में मौजूद न्यूरोट्रांसमीटर यानी सेरोटोनिन पर पड़ता है। सेरोटोनिन एक ऐसा रसायन है जो हमारे मूड, खुशी और मानसिक शांति को नियंत्रित करने का काम करता है, और जब हॉर्मोन्स के असंतुलन के कारण इसका स्तर कम होता है, तो महिलाओं में एंग्जायटी, डिप्रेशन, अत्यधिक गुस्सा और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं चरम पर पहुंच जाती हैं। इस स्थिति को चिकित्सकीय भाषा में प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर (PMDD) या प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS) का गंभीर रूप कहा जाता है। कई महिलाओं के लिए यह हफ्ता शारीरिक दर्द से ज्यादा मानसिक रूप से बेहद कष्टदायक साबित होता है, जहां वे खुद को बिना किसी स्पष्ट कारण के अत्यधिक डरा हुआ या तनाव में महसूस करती हैं। इन लक्षणों को केवल यह कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि यह तो हर महीने का है, क्योंकि यह महिलाओं की दैनिक कार्यक्षमता और मानसिक शांति को बुरी तरह प्रभावित करता है।

बाइपोलर डिसऑर्डर और प्रीमेंस्ट्रुअल मूड स्विंग्स के बीच का यह खतरनाक और छिपा हुआ कनेक्शन

जब बात मानसिक स्वास्थ्य की आती है, तो बाइपोलर डिसऑर्डर एक ऐसी गंभीर स्थिति है जिसमें व्यक्ति के मूड में अत्यधिक और अचानक बदलाव होते हैं, जिसमें एक तरफ अत्यधिक उत्साह या उन्माद (Mania) होता है तो दूसरी तरफ गहरा डिप्रेशन (Depression) होता है। शोधकर्ताओं और स्त्री रोग विशेषज्ञों ने पाया है कि जिन महिलाओं को पहले से बाइपोलर डिसऑर्डर की समस्या होती है, उनके हॉर्मोनल चक्र और मानसिक स्वास्थ्य का यह मेल उनके लक्षणों को कई गुना अधिक गंभीर बना देता है। पीरियड्स से पहले होने वाला हॉर्मोनल पतन बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित महिलाओं में डिप्रेसन के एपिसोड्स को ट्रिगर कर सकता है, जिससे उनकी एंग्जायटी और मानसिक अस्थिरता खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है। इसे प्रीमेंस्ट्रुअल एक्सेर्बेशन (Pre-menstrual Exacerbation) कहा जाता है, जहां मासिक धर्म के चक्र के कारण पहले से मौजूद मानसिक बीमारियां और अधिक विकराल रूप धारण कर लेती हैं। इस स्थिति में महिलाओं के लिए यह पहचानना बहुत मुश्किल हो जाता है कि उनका यह तनाव सामान्य हॉर्मोनल बदलाव का नतीजा है या फिर किसी मानसिक विकार का गहरा प्रभाव, जिसके लिए मनोचिकित्सक की सलाह लेना अनिवार्य हो जाता है।

इस मानसिक जद्दोजहद और एंग्जायटी से निपटने के लिए जीवनशैली में क्या बदलाव हैं जरूरी

यदि आप या आपके परिवार में कोई महिला हर महीने पीरियड्स से पहले इस तरह की गंभीर एंग्जायटी, मूड स्विंग्स और मानसिक तनाव का सामना करती है, तो घबराने के बजाय कुछ वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीकों को अपनाकर इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है। सबसे पहले, अपने खान-पान में कैफीन, चीनी, और अत्यधिक नमक की मात्रा को कम कर दें क्योंकि ये चीजें शरीर में एंग्जायटी और पानी के ठहराव को बढ़ाने का काम करती हैं। इसके अलावा, नियमित रूप से योग, मेडिटेशन और ब्रीदिंग एक्सरसाइज करने से मस्तिष्क में सेरोटोनिन का स्तर संतुलित रहता है और मानसिक शांति मिलती है। पर्याप्त नींद लेना और शारीरिक रूप से सक्रिय रहना भी हॉर्मोनल असंतुलन के प्रभावों को कम करने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। यदि लक्षण बहुत अधिक गंभीर हैं और रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं, तो किसी अच्छे स्त्री रोग विशेषज्ञ और मनोचिकित्सक से संपर्क करके कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) या अन्य उचित चिकित्सीय परामर्श जरूर लें। समय रहते सही पहचान और उपचार से इस मानसिक चुनौती का सामना आसानी से किया जा सकता है और एक स्वस्थ व संतुलित जीवन जिया जा सकता है।