Petrol Diesel Price Hike Alert: क्या फिर महंगे होंगे पेट्रोल और डीजल, विदेशी ब्रोकरेज फर्म जेफरीज की इस रिपोर्ट ने बढ़ाई आम जनता की टेंशन

Petrol Diesel Price Hike Alert: क्या फिर महंगे होंगे पेट्रोल और डीजल, विदेशी ब्रोकरेज फर्म जेफरीज की इस रिपोर्ट ने बढ़ाई आम जनता की टेंशन

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत में ईंधन के दामों को लेकर एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के बावजूद, देश की सरकारी तेल विपणन कंपनियां (OMCs) इस समय भारी वित्तीय नुकसान का सामना कर रही हैं। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म जेफरीज (Jefferies) की ओर से जारी एक ताजा और चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, तेल कंपनियों को वर्तमान में बेचे जा रहे पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर लगभग 7 से 8 रुपये का तगड़ा घाटा उठाना पड़ रहा है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अब यह आशंका तेजी से गहराने लगी है कि आने वाले दिनों में आम उपभोक्ताओं को एक बार फिर से महंगे ईंधन का झटका लग सकता है।

जानिए क्यों नहीं सुधर रहे तेल कंपनियों के हालात और क्या है घाटे की मुख्य वजह

जेफरीज की इस विशेष रिपोर्ट में विस्तार से विश्लेषण किया गया है कि आखिर ईंधन की मौजूदा कीमतों के बावजूद तेल कंपनियों की माली हालत में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इसकी मुख्य वजह मार्च 2026 में केंद्र सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) में की गई भारी कटौती है। आपको याद दिला दें कि सरकार ने मार्च महीने में आम जनता को राहत देने के उद्देश्य से पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क को करीब 40 फीसदी तक घटा दिया था, जिसके बाद देश में टैक्स की दरें पिछले 10 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थीं। इस कटौती से जनता को तो राहत मिली, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम ऊंचे रहने के कारण अब तेल विपणन कंपनियों का मार्जिन पूरी तरह खत्म हो गया है और वे सीधे तौर पर घाटे में आ गई हैं।

$85-87 प्रति बैरल है ब्रेक ईवन स्तर, $90 के पार गया क्रूड तो बढ़ेंगे दाम

विदेशी ब्रोकरेज फर्म जेफरीज के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि तेल विपणन कंपनियां पेट्रोल और डीजल पर हो रहे इस बड़े नुकसान से तभी पूरी तरह बाहर निकल पाएंगी, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमत घटकर 85 से 87 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में आ जाएगी। मौजूदा खुदरा कीमतों के हिसाब से भारतीय तेल कंपनियों के लिए यही 'ब्रेक ईवन' (ना लाभ, ना हानि) का स्तर है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर कच्चा तेल इस स्तर से ऊपर बना रहता है तो कंपनियां लगातार घाटे में रहेंगी, जबकि इससे नीचे आने पर ही उन्हें सामान्य मुनाफा मिलना शुरू होगा। रिपोर्ट में साफ तौर पर आगाह किया गया है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास या उससे ऊपर बना रहता है, तो आर्थिक संतुलन बनाने के लिए कंपनियों को आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल के दामों में और ज्यादा बढ़ोतरी करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

कच्चे तेल की महंगाई से सरकार पर बढ़ेगा ₹90,000 करोड़ का भारी-भरकम बोझ

रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरी स्थिति का सीधा असर केवल तेल कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और सरकारी खजाने पर भी पड़ने वाला है। ब्रोकरेज का अनुमान है कि अगर ब्रेंट क्रूड की कीमत $90 प्रति बैरल के स्तर पर टिकी रहती है, तो पेट्रोलियम और उर्वरक (फर्टिलाइजर) पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाएगा। इसके साथ ही तेल से होने वाली टैक्स आय में भी भारी कमी आएगी। इन दोनों कारणों की वजह से केंद्र सरकार पर करीब 75,000 करोड़ से लेकर 90,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है, जो भारत की कुल जीडीपी (GDP) के 20 से 25 बेसिस पॉइंट्स के बराबर है।

यूरिया और एलएनजी की बढ़ी लागत, फर्टिलाइजर सब्सिडी का खर्च ₹40,000 करोड़ बढ़ने का अनुमान

जेफरीज ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण देश का सब्सिडी बिल पहले ही काफी बढ़ चुका है, जिससे तेल कंपनियों को इस आर्थिक संकट से उबारने के लिए सरकार के पास वित्तीय मदद देने की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ब्रेंट क्रूड $90 प्रति बैरल पर रहता है, तो वित्त वर्ष 2027 में केवल उर्वरक सब्सिडी पर होने वाला खर्च ही 30,000 से 40,000 करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतें पहले ही लगभग दोगुनी हो चुकी हैं और भारत द्वारा आयात की जाने वाली एलएनजी (LNG) की लागत में भी 40 से 50 फीसदी तक का भारी उछाल आया है।

कमजोर मानसून की आशंका ने बढ़ाई चिंता, गैर-रक्षा पूंजीगत खर्च में हो सकती है कटौती

इन आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ इस साल कमजोर मानसून की आशंका ने भी सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जेफरीज की रिपोर्ट के अनुसार, यदि मानसून कमजोर रहता है तो ग्रामीण इलाकों में संकट बढ़ सकता है, जिससे निपटने के लिए सरकार को ग्रामीण रोजगार योजनाओं (जैसे मनरेगा) पर अपना खर्च बढ़ाना पड़ेगा। ऐसे वित्तीय दबाव के माहौल में सरकार देश के गैर-रक्षा पूंजीगत खर्च (Non-Defense Capital Expenditure) में कुछ कटौती का फैसला ले सकती है। वहीं, इस अतिरिक्त वित्तीय घाटे की भरपाई और राजस्व जुटाने के लिए सरकार ने हाल ही में सोना और चांदी पर कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) में बढ़ोतरी की है, और सरकार को उम्मीद है कि आगामी विनिवेश (Disinvestment) प्रक्रियाओं से भी इस साल लक्ष्य से अधिक कमाई होगी।

 

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