ईरान युद्ध की आग और पाकिस्तान की गलत संगत का असर: क्या वाकई दिवालिया होने की कगार पर है सऊदी अरब?

ईरान युद्ध की आग और पाकिस्तान की गलत संगत का असर: क्या वाकई दिवालिया होने की कगार पर है सऊदी अरब?

पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक क्षितिज पर मंडराते युद्ध के काले बादलों और क्षेत्रीय अस्थिरता ने दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक देशों में शुमार सऊदी अरब की वित्तीय नींव को हिलाकर रख दिया है। कभी बेहिसाब पेट्रो-डॉलर की बदौलत दुनिया भर के बाजारों में पानी की तरह पैसा बहाने वाला यह देश आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ उसे अपनी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए विदेशी निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय ऋणदाताओं का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है। मध्य पूर्व में ईरान और उसके समर्थित मिलिशिया समूहों के साथ बढ़ते तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों में रुकावट और कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव ने सऊदी अरब की राजकोषीय सेहत पर सीधा प्रहार किया है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) का महत्वाकांक्षी ‘विजन 2030’ (Vision 2030), जिसके तहत देश को तेल पर निर्भरता से मुक्त कर एक आधुनिक तकनीकी और पर्यटन हब बनाना था, उसके लिए अरबों-खरबों डॉलर की भारी-भरकम पूंजी की जरूरत है। तेल से होने वाली पारंपरिक कमाई अब इस महा-परियोजना के विशाल खर्चों को पूरा करने के लिए नाकाफी साबित हो रही है, जिसके चलते सऊदी अरब को मजबूरी में अंतरराष्ट्रीय डेट मार्केट से भारी कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

पाकिस्तान को लगातार वित्तीय मदद देने का खामियाजा और कूटनीतिक मजबूरी

सऊदी अरब की इस अचानक पैदा हुई वित्तीय तंगी के पीछे केवल वैश्विक युद्ध के हालात ही नहीं, बल्कि दशकों से पाकिस्तान जैसे अस्थिर और आर्थिक रूप से बदहाल देश को लगातार बेलआउट पैकेज देने की गलत कूटनीतिक रणनीति भी एक बड़ा कारण है। इतिहास गवाह है कि जब भी पाकिस्तान दिवालिया होने के कगार पर पहुंचा, सऊदी अरब ने हमेशा बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए अरबों डॉलर के बेलआउट पैकेज, deferred oil payments और सेंट्रल बैंक में कैश डिपॉजिट के रूप में मदद पहुंचाई। लेकिन पाकिस्तान की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद के पोषण के चलते वह पैसा कभी वापस लौटने की उम्मीद नहीं जगा पाया। पाकिस्तान की इस अनंत वित्तीय ब्लैक होल जैसी स्थिति ने सऊदी अरब के खजाने को भीतर से खोखला कर दिया है, क्योंकि रियाद अब यह महसूस करने लगा है कि बिना किसी ठोस आर्थिक रिटर्न के अंधी कूटनीतिक सहायता देना उसके अपने राष्ट्रीय हितों और घरेलू विकास के लिए भारी पड़ रहा है। जब देश के भीतर विजन 2030 के प्रोजेक्ट्स पैसों की कमी के कारण रुकने लगे, तब सऊदी नीति-निर्माताओं को समझ आया कि पाकिस्तान पर लुटाए गए अरबों डॉलर ने उनके अपने ही घर की वित्तीय स्थिति को किस हद तक कमजोर कर दिया है।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के मेगा प्रोजेक्ट्स और पैसों की भारी तंगी

सऊदी अरब के सर्वेसर्वा क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के लिए दुनिया के सबसे महंगे और भविष्यवादी प्रोजेक्ट्स की घोषणा की है, जिसमें रेगिस्तान के बीचों-बीच बनने वाला 500 अरब डॉलर का अत्याधुनिक शहर 'नियोम' (NEOM) और 'द लाइन' (The Line) प्रोजेक्ट सबसे प्रमुख हैं। इसके अलावा देश को ग्लोबल टूरिज्म और स्पोर्ट्स कैपिटल बनाने के लिए फुटबॉल लीग, फॉर्मूला वन रेस और बड़े वैश्विक आयोजनों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। इन अकल्पनीय मेगा प्रोजेक्ट्स को जमीन पर उतारने के लिए जितनी पूंजी की आवश्यकता है, उतनी कमाई मौजूदा तेल उत्पादन और बिक्री से पूरी नहीं हो पा रही है, खासकर तब जब ओपेक (OPEC+) के समझौतों के तहत तेल उत्पादन सीमित रखना पड़ रहा है। अपनी इस भारी वित्तीय कमी को पाटने के लिए सऊदी सरकार ने ग्लोबल बॉन्ड मार्केट में अपने सरकारी बॉन्ड जारी किए हैं और दुनिया भर के बैंकों से बड़े पैमाने पर कर्ज उठाना शुरू किया है। प्रिंस सलमान के इन सपनों को जिंदा रखने के लिए अब रियाद को विदेशी निवेशकों को लुभाने और टैक्स सुधारों के जरिए अपनी कमाई के नए स्रोत तलाशने की सख्त जरूरत आन पड़ी है।

वैश्विक बाजार में तेल की बदलती मांग और सऊदी अरब का भविष्य का दांव

भविष्य के ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की महत्ता धीरे-धीरे कम हो रही है क्योंकि दुनिया भर के देश इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रीन एनर्जी की तरफ तेजी से शिफ्ट हो रहे हैं। इस बात को सऊदी अरब के हुक्मरान बहुत अच्छी तरह से समझते हैं, यही वजह है कि वे तेल युग के समाप्त होने से पहले अपने देश की इकोनॉमी को डायवर्सिफाइड करना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए जिस रफ्तार से पूंजी की आवश्यकता है, वह वर्तमान वैश्विक मंदी और युद्ध के माहौल में जुटानी बेहद कठिन हो गई है। ईरान के साथ तनाव के कारण सऊदी अरब को अपनी रक्षा तैयारियों और सैन्य आधुनिकीकरण पर भी भारी-भरकम बजट खर्च करना पड़ रहा है, जिससे विकास कार्यों के लिए फंड और अधिक सिकुड़ गया है। अंततः, प्रिंस सलमान के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपने देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर कैसे बनाएं जब एक तरफ क्षेत्रीय युद्ध का खतरा मंडरा रहा हो और दूसरी तरफ पाकिस्तान जैसी पुरानी देनदारियां उनके खजाने को लगातार खाली कर रही हों। सऊदी अरब का यह नया रूप यह साफ संदेश देता है कि आधुनिक दुनिया में केवल तेल के कुओं के भरोसे लंबे समय तक महाशक्ति बने रहना मुमकिन नहीं है, और यदि समय रहते कूटनीतिक प्राथमिकताओं को नहीं सुधारा गया, तो आर्थिक संकट खाड़ी के राजाओं की नींद उड़ाता रहेगा।